गुरुवार, 23 जून 2016

विजन इण्डिया फाउण्डेविज 20 दिवसीय कार्यशाला जून 2016


18 जून 2016 को हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन के 20 दिवसीय कार्यशाला में एक दिन सम्मलित हुये। शिवगंगा झाबुआ की ओर से हम वहाँ सामाजिक सहभागिता के अनुभवों के आदान प्रदान के लिये पहुँचे। हमारे लिये दिल्ली पहुँचने तक यह भी मालूम नहीं था कि कार्यक्रम के आयोजन कर्ता कौन हैं ? चिन्मय जैन ने अप्रैल में मुझे बताया था कि एक कैंप आईआईटी दिल्ली कि लड़कों का है, जिसमें आपको उसमें पब्लिक पार्टीशिपेशन विषय रखना है। कार्यक्रम जून में था इसलिए मैंने हाँ कह दिया। चिन्मय झाबुआ आते जाते रहते हैं इसलिये मैं निश्चिंत था पर मैंने उनसे कहा कि हम झाबुआ से एक नहीं, चार व्यक्ति वहाँ जाना चाहेंगे, चिन्मय ने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों से बात करके हम चार व्यक्तियों को उसमें (विजन इण्डिया फाउण्डेशन) के कार्यक्रम में सहभागी बनने की सहमति दे दी ।

17 जून अर्थात ट्रैन में ही हमको पता चला कि कैंप स्थल सोनीपत में है और हमें नई दिल्ली के स्थान पर न उतरकर पानीपत में ट्रेन से उतरना चाहिए। चिन्मय जी ने हमें अजेय का मोबाइल नम्बर दिया। हमने अजेय से बात की, अजेय ने हमें पानीपत रेलवे स्टशन पर रिसीव करने की बात कही। सुबह जब हम पानीपत स्टेशन पर पहुँचे तो अजेय वहाँ पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रात: 6 बजे थे, वहाँ से एक घंटे का सफर और शेष था हम 7 बजे "जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी" के भव्य एवं अत्यधिक आधुनिक कैंपस में पहुँच गये।  
इस कैंपस में 200 फुट ऊँचे खंबे पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हवा पूर्ण तेजस्विता के साथ लहरा रहा था। यूनिवर्सिटी कैंपस की भव्यता बता रही थी कि आधुनिक भारत के शिक्षा केन्द्र में आपका तहे दिल से स्वागत है। पानीपत से सोनीपत की एक घंटे की यात्रा में हमने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के विषय में जानकारी प्राप्त की। हम जैसे जैसे अजेय जी से बात करते जा रहे थे,  अजेय हमें बता रहे थे कि कैसे विजन इण्डिया फाउण्डेशन का निर्माण हुआ ।

अजेय ने कहा कि भारत के युवा देश के लिये बहुत कुछ करना चाहते हैं पर उन्हें ऐसा माहौल नहीं मिलता। विजन इण्डिया फाउण्डेशन युवाओं को ऐसा वातावरण देना चाहता है, जिसमें उन्हें काम करने में आनन्द आये,  वह उत्साह से भरे रहें, युवाओं को भविष्य की चुनौतियाँ क्या हैं ? वे चुनौतियों को स्वीकार करें और उनको समझ कर उन चुनौतियों से निपटने का सशक्त रास्ता बनायें।

अजेय के बोलने में उनका आत्मविश्वास स्पष्ट झलक रहा था। उनकी वाॅडी लैंग्वेज कह रही थी कि महेश जी दुनिया के आने वाले स्वर्णिम भविष्य का निर्माण भारत के युवा बनायेंगे, आप निश्चिंत रहें। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को आश्वस्त कर रही थी। हमारी जिज्ञसायें थीं जिन्हें हमने बातचीत के जरिये, शान्त किया। हम जानना चाहते थे कि यहाँ 140 विद्यार्थी कहाँ कहाँ से आये हैं ? अजेय ने बताया कि ये सभी स्टूडेंट्स भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से यहाँ विद्यार्थी बनकर आये हैं। बेंगलूर की लाॅ यूनिवर्सिटी से कुछ छात्र थे तो कुछ जेएनयू से। आईआईटी दिल्ली,  मुम्बई रुड़की,  कानपुर बहुत से महाविद्यालय जिनके हमें अब नाम भी याद नहीं रहे।

हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन में स्पीकर थे अत: हमारी सहायता व सेवा के लिये जिस विद्यार्थी की ड्यूटी लगाई
उनका नाम था अनिल। अनिल उन 30 प्रबन्धकों में से एक थे जो इस bootcamp की सफलता के सूत्रधार थे। कुछ ही समय के अन्दर उनकी कार्यकुशलता को देखकर, हमें यह लगने लगा छोटे छोटे दिखने वाले ये लड़के बहुत बड़े काम करने में  सक्षम सक्षम रहे हैं, हमें भी इनका सहयोग करना चाहिए, हमारे सहायक बनाये गये अनिल के चेहरे का तेज बताता था कि वह कुछ बड़ा करने का आत्मविश्वास प्राप्त कर चुका है। अनिल भारत के किस प्रान्त से हैं यह मैं भूल गया।

हमारे मन में यह प्रश्न बार बार उठता कि विजन इण्डिया फाउण्डेशन की स्थापना किसने की ? पर होता यह कि जिस 'व्यवस्थापक' विद्यार्थी से बात करो वही हमें विजन इण्डिया फाउण्डेशन का संस्थापक लगने लगता था, हमने भी सोचा जो भी संस्थापक हो बाद में पता कर लेंगे, काम तो सब कुछ अच्छा। bootcamp में 140 छात्र प्रतिभागी थे और उनकी व्यवस्था में 30 छात्र। यह सब यहाँ क्यों आये? इन्हें क्या करना है? इन सभी बातों के  उत्तर हमें मिल गये थे फिर भी इन सभी का सामूहिक उद्देश्य था कि अपने देश को विश्व की महाशक्ति बनाना है, इस काम के लिये जो जो काम करना जरूरी है वह करेंगें, जिस प्रकार की शिक्षा चाहिये वह लेंगे, सीखेंगे। उन विद्यार्थियों के शब्द कम उनकी आँखों की चमक बताती थी की ये कुछ करके ही दम लेंगे।

शिवजी के हलमा की लघु फिल्म दिखाकर हमने अपने विषय को तीन भागों में में पूर्ण किया। पहले भाग में मे राजाराम कटारा जी और भवरसिंह भयड़िया जी ने शिवगंगा झाबुआ के कार्य कार्यक्रम व उनके उद्देश्य, दृश्य एवं श्रव्य माध्यम से  से 25 मिनट में बताये, मैंने तो मेरे अनुभव सुनाये-मुझे झाबुआ के विषय में 1998 में जो बताया गया था अर्थात झाबुआ की इमेज, और कुछ समय बाद वास्तव में मुझे झाबुआ दिखा, झाबुआ की इमेज अच्छी नहीं है पर झाबुआ बहुत अच्छा है। झाबुआ को उपदेश देकर नहीं समझ सकते। वहाँ से सीखने के लिये भी बहुत ज्ञान की बातें हैं। करने के लिये भी बहुत काम हैं।

वहाँ का मंच न केवल आकर्षक था अपितु श्रोता और वक्ता की बीच एक  शक्तिशाली माध्यम बनाता था।
कठिन से कठिन विषयों की जुगाली(विचार विमर्श ) करने के लिये लिये एक और अन्य स्थान था  जिसका नाम था "अड्डा" अड्डा में बैठकर छात्र घंटों तक डिस्कस करते। हमारा विषय समाप्त हुआ, हम चाय पान के पश्चात जब हम अड्डे पर पहुँचे तो प्रश्न उत्तर शुरू हो गये, बातों ही बातों में हमें पता ही ना चला कि कब साम के छ: बज गये। डेड़ घंटे का समय सार्थक विचार विमर्श में समाप्त हो गया। समय तो हमेशा ही कम पड़त है पर 18 जून के उस डेड़ घंटे में हमारी झोली नये ज्ञान से लबालब भरी थी
सदा प्रसन्न रहनेवाले ये छात्र विजन इण्डिया फाउण्डेशन के कार्यक्रम में आये भारत का लघुकथा रूप थे। वे आपस में इतने घुल मिल गये थे कि उनमें कौन कब से , कहाँ से दोस्त बना, जानना मुश्किल था। वे अधिकांश लँगोटिया यार (बचपन के दोस्त) लग रहे थे। उन प्रतिभागी छात्रों में परस्पर 'वर्किंग टू गैदर इज सक्सेस' का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हो रहा था।
  170 विजनरी नवयुवक इसमें बन रहे थे। लिविंग टू गैर इज प्रोग्रेस के सूत्र के अनुसार बना रहे थे। साथ रहकर सीख रहे थे।
युवाओं  की ऐसी मस्ती तो बहुत जगह दिख सकती है पर इस यंग इण्डिया में एक साथ एकट्ठे होने में ' हम मस्तों में आने मिले कोई हिम्मत वाला रे' का आह्वान स्पष्ट दिख रहा था। उन छात्रों के बीच विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों ने ऐसा कुछ वातावरण तैयार किया था जिससे वह चाहे जैसे फिल्मी गाने गाते हों पर उसकी ध्वनि "यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में , मस्ती है झूमे ...... के भाव सभी के मन में थे।

कुल मिलाकर विजन इण्डिया फाउण्डेशन ने हमें उस समय चौंका दिया कि जब। में पता चला इसके आयोजक आईआईटी रुड़की और दिल्ली,  मुंबई के कुछ याने सात यंग शिक्षक हैं, ठीक कहा 7 शिक्षक। चाणक्य सीरियल के शिक्षक, न कि किसी आईआईटी कालेज के फैकल्टी मैंम्बर । धन की सरकारी सहायता के बिना उससे आर्थिक सहायता की अपेक्षा किये बिना, यह नये स्वर्णिम भारत के निर्माण में लगे हैं।

जब हमने पूछा कि इतने अधिक बजट की यह 20 दिवसीय कार्यशाला बिना धन के कैसे चल रही है? हमारे साथी मित्र अनिल ने बताया कि यहाँ आया प्रत्येक विद्यार्थी 30 हजार रुपये शुल्क देकर आया है। प्रत्येक वप्रत्ये30000/= रुपये 20 दिन की शिक्षा?  हमें आश्चर्य तो हो रहा है पर सत्य को झुठलाया भी नहीं जा सकता।

धन्यवाद विजन इण्डिया फाउण्डेशन एवं उनकी टीम, नोमेश शोभित मोहित अजेय पराग आनन्द चिन्मय। 
सभी टीम सदस्य ! और कुछ हो न हो पर आपके माता पिताओं ने आप लोगों के नाम सोच समझ के ही रखे हैं , आपके काम को देख कर तो यही लगता रहा है ।
महेश शर्मा 'शिवगंगा गुरुकुल धरमपुरी झाबुआ' मध्यप्रदेश ।।