मंगलवार, 9 जनवरी 2018

आधुनिक काल के एक ऋषि::प्रोफेसर केबीएल पाण्डेय


दिल्ली, मुम्बई और ऐसे ही महानगरों के लोग जब ट्रेन से मुरेना के पास से गुजरते हैं तो बीहडों को खिड़कियों से झाँक कर ऐसे देखते हैं जैसे वहाँ डाकू लोग पटरी के पास बैठे रहते हों। चलती गाडड़ी में वे सुरक्षित भी हैं थ्रिल का मजा लेने में।
बाढ़ देखने में भी आनन्द पाने वालों से आप संवेदना की अपेक्षा कर सकते हैं क्या?

वही बात उन लोगों की है जो आदिवासियों के बारे में विश्लेषण विहीन नासमझ धारणा बनाये हैं। वे अब तक उन सुनी सुनाइयों में पडे हैं जिनके अनुसार आदिवासी अपराधी, नशेड़ी, कृतघ्न, अविश्वसनीय हैं। उन्हें उनकी बेहद अनुशासित सामाजिक प्रथाएँ मुक्त कामपरक या जंगली लगती हैं। वे नहीं जानते कि इन आदिवासियों की सामाजिक  संरचना में कोई संविधान निहित है।

आदिवासियों के तीर कमान और अन्य जीवन से जुड़ी चीजें अभिजात लोगों के ड्राइंग रूम सजाने में टँगी रखी हैं उनके गीत, नृत्य, भद्र जनों को मजा देने के काम में आते हैं लेकिन ये भद्र जन? नहीं जानते कि श्रमिक वर्ग कला का विकास जीवन से जुड़ी वस्तुओं में करता है, सिर्फ़ कला या मनोरंजन के लिए नहीं।

न्याय परस्पर सहयोग करुणा आदि की जो सुचिन्तित परम्परा उनकी किताबों में है उनके एक दो पन्ने ही हम पढ़ लें तो शायद मनुष्यता के कुछ करीब पहुँचें। युगों के निर्मम शोषण और उपेक्षा के शिकार हैं ये। उनकी सरलता उनकी विवशता अभावग्रस्तता को शताब्दियों से लूटा जाता रहा। उन्हें मुख्य धारा में लाने का जो विचारहीन दौर चलाया गया उसमें उनके संसाधन व्यापारियों, नव जमीदारों और ठेकेदारों ने हड़प लिये।

सड़कें उनके उतने काम नहीं आयीं जितनी बाहरी घुसपैठियों के लिए। जंगल आरा मशीनों ने हलाल कर दिये, जमीनों पर बडों के खाते खुल गये। सरकारों के पास उनके विकास का कोई प्रारूप था ही नहीं। उनके पास कभी कभी दया के कुछ दाने छिड़क कर गौरवान्वित होने के समारोह भर थे। इतने बड़े समाज को रचनात्मक और संश्लिश्ट चेतना के तौर पर समझा ही नहीं गया।

उन्हें लोकतंत्र के सहगान में शामिल न करके उनसे रैलियों और जुलूसों में नारे लगवाये गये। लेकिन अपने ही इतिहास के पन्ने पलटते हुए झाबुआ के भील भिलाले पटेलिया अब हलमा परम्परा के द्वारा अपने विकास को आकार दे रहे हैं। पानी, पेड़, पहाड़ के सामूहिक लोकगीत इसी तरह रचे जाते हैं।

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

महान है जनजाति समाज

धारणा ऐसी ऐसीं
ये लोग तो कटी उँगली पर भी नहीं मूतते हैं ?
पर सत्य कुछ और ही निकला...

17-18 फरवरी को हाथीपावा पर हलमा है। हलमा में आने के लिए अभी तक 400 गाँव के  20 हजार से अधिक लोगों ने पंजीयन करा लिया है। हलमा में आने की मुख्य प्रेरणा धरती माता की प्यास बुझाना है, परमार्थ का भाव लिये झाबुआ अलीराजपुर से माता बहन बेटी, पुरुष हजारों की संख्या मे अपने अपने गाँवों से स्वयं के खर्चे पर चलकर आते हैं।

ग्रामीण परिवारों को हाट बजार के कारण 6-7 घंटे घर से बाहर निकलना तो आसान रहता है पर दो दिन घर से बाहर निकलने के लिये उन्हें बहुत बड़ी योजना बनाना होती है। जानबरों को भोजन पानी और घर के अत्यधिक बुजुर्गों की सेवा जिम्मेदारी घर के एक सदस्य को सोंप कर हलमा में आना आसान नहीं होता। पर्यावरण के संवर्धन से जन जन के चेहरे पर खुशहाली आयेगी, केबल और केबल यही भावना उनसे आदिवासी बन्धुओं से यह बड़ा काम करवा लेती है।

जनजाति के ये लोग कितने महान हैं? हलमा का आयोजन न हुआ होता तो इन आदिवासी बहन भाइयों के उच्चादर्शों को जानने से दुनियाँ के लोग बंचित ही रह जाते। अभी भी हलमा देखने के बाद अपने आपको सुसंस्कृत माननेवाले लोग, इन्हें सुधरजाने का उपदेश देने से नहीं चूक जबकि उन तथा कथित सुसभ्य के लोगों के सामने यही आदिवासी बच्चे बूढ़े सभी एक साथ मिलकर बिगड़े पर्यावरण को संतुलित करने के लिये परमार्थ केलिये एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे होते हैं।

जनजाति के इन निष्काम कर्मयोगियों को पता है कि मानव के अत्यधिक उपभोग करने से दुनियाँ का पर्यावरण असंतुलित हो गया है, पर्यावरण का संतुलन जल जंगल जमीन के संवर्धन और संरक्षण से होगा। इसका निदान मिल जुलकर श्रम-सीकर बहाने से होगा। फिर भी इन परमार्थी सज्जनों से पूछा जाता है कि आपको इससे क्या फायदा होगा? हलमा आये लोग इस बेतुके प्रश्न का क्या उत्तर दें? चुप रह जाते हैं। यद्यपि
"झाबुआ अलीराजपुर के जनजाति समाज को अत्याधुनिक एवं युगानुकूल ज्ञान की, प्रचुर मात्रा में संसाधनों के उपलब्धता  की, नगद धन की, सरकारी योजनाओं को वास्तविक रूप में उन तक पहुँचने की महती एवं सख्त जरूरत है।"

झाबुआ में रहते हुये मुझे 20 साल होने को आ गये। दस साल से अनवरत मैं कुछ बाते सुनता रहा हूँ, उन पर विचार करता रहा हूँ, मुझे जो बाते बताई गयीं कि ये आदिवासी लोग (भील, भिलाला पटैलिया) अत्यधिक स्वार्थी समाज हैं।

इन बातों, उलाहनों को सुनते हुये मैंने बार बार दो तरह के दृश्य देखे। एक शहरी परिवेश और एक झाबुआ के गाँवों का दृश्य। शहरों में झाबुआ के गाँवों में जनजाति समाज के प्रति धारणाओं की झूँठी जानकारियाँ मिलती और दूसरी तरफ गावों में अत्यधिक प्रेम परोपकार के व्यवहार को आचरण में चरितार्थ होते देखने का मौका मिलता। बड़ा असमंजस रहता, यह सही या वह सही? सत्य जानने की जिज्ञासा बलवती होती गयी।

शहरों के बहसंख्य निवासिओं के मन में जनजाति समाज के प्रति बनीं धारणायें जो सुनी सुनाईं प्रायः असत्य ही हैं, बहुत दुखद हैं। वे असत्य धारणायें सामाजिक विषमता को जन्म देती रहतीं हैं। शहरी लोगों के हृदय में भी झाबुआ के जनजाति समाज की सही तस्वीर बनना सामाजिक सहअस्तित्त्व के लिए यह बहुत आवश्यक काम भी है। धारणाओं की कुछ बानगियाँ पढ़िये...

शहरों में जो भी लोग हैं तथा जनजाति समाज के प्रति धारणा पाले हुये हैं, बुरे लोग नहीं है, वे सभी मन बचन कर्म से अच्छे लोग हैं पर आदिवासी समाज के प्रति उनकी धारणायें एक से एक विचित्र हैं, आप भी उन्हें जानिये।

अरे! .........
1- ए तो दारूकुट्टे! इनसे आप परमार्थ करबाओगे? ये कटी उँगली पर तो मूतते नहीं हैं।
2- इनसे पेड़ लगबाओगे? ये पेड़ काटना जानते हैं, इनके बापने भी कभी एक पौधा नहीं लगाया।
3- इनको झगड़े टंटे के अलावा कुछ भी आता नहीं है।
4- ये मजदूरी करके कुछ कमा धमा लेते हैं फिर ये किसी की नहीं सुनते।
5- ये क्या सुधरेंगे? इन्हें दारू पीकर कुर्राटी लगाना आता है।
6- दहेज-दापा ने इन्हें बरबाद कर दिया।
7- ये लड़कियों को औने पौने दाम में बेच देते हैं
8- 'भगौरिया हाट' लड़की को भगाकर शादी करने का मेला है।

एक महिला जो लेक्चरर भी हैं, ने तो यहाँ तक कह दिया कि हम इनको अच्छी तरह जानते हैं, आप नहीं जानते इन्हें, सरकार ने भी इन्हें सर पर चढ़ा रखा है, आप भी इनकी सेवा में लगे हो, देखना शर्मा जी मैं जिंदा रहूँगी, देखना यही आपका गला काट देंगे, इनसे ज्यादा धोखेबाज कोई नहीं होता।

सोरवा में एक व्यक्ति बोला ए लोग जिन्दा आदमी का कलेजा निकालकर खा जाते हैं। सोरवा एसिया का सबसे बड़ा आपराधिक क्षेत्र है। माछलिया घाट से चले पिटौल निकल तो तो कहते-जान बची और लाखों पाये। दातरे (हँसिया या दराता) में म्यान नहीं भीलों में ज्ञान नहीं।

यह सब बातें बिना प्रमाण के एक कान से दूसरे कान होती हुईं धारणाओं के रूप में घनीभूत हो गयीं और झाबुआ अंचल को उस रूप में बताती रहीं जिसका झाबुआ के जनजाति समाज का उन धारणाओं से कोई सरोकार नहीं। आज भी ऐसी धारणायें पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं हैं, आंशिक कभी जरूर आई है।

हलमा परम्परा भील भिलाला पटैलिया समाज की महान सामाजिक परम्परा है। झाबुआ को सही रूप में समझने के लिये हलमा कार्यक्रम भी एक मौका है। झाबुआ आलीराजपुर क्षेत्र में ऐसी अनेक श्रेष्ठ परम्परायें हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। झाबुआ के जनजाति समाज को सिखाने की जगह झाबुआ को समझने और सीखने की जरूरत है, यहाँँ उनके आचरण से उपदेश गृहण करने जरूरत है।

अयोध्या में राम, मथुरा में एक कृष्ण, काशी में विश्वनाथ के दर्शन केलिये तीर्थयात्री जाते हैं। झाबुआ में आइये, गाँवों में रहिये।17-18 फरवरी2018 को राम, कृष्ण, विश्वनाथ का परमार्थी रूप हलमा के माध्यम से प्रत्यक्ष देखिये।