आजादी के बाद झाबुआ के भीलों की स्थिति
भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भील है। भारतीय जनगणना में भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भी भील ही है। आदिवासी शब्द का मतलब भी झाबुआ में भील, भिलाला पटलिया से ही है। जनजाति का भी वही अर्थ है।
1860 के आसपास अँग्रेजों ने भीलों से दो महत्तवपूर्ण शक्तियाँ छीन लीं। भीलों के पास वनों का के स्वामित्त्व का अधिकार था इसलिये उन्हें वनवासी कहते थे, वनों पर भीलों का अधिकर खतम करने के लिये भीलों को वनवासी की जगह अमरीका का शब्द आदिवासी स्थापित करके एक साथ दो काम अँग्जों ने कर।लिये। जब भील अपने आपको वनवासी कहते थे तब तक उनका वनों पर नैसर्गिक अधिकार था, इसी शब्द के चलते अँग्रेज भीलों से वन के अधिकार छीन नहीं पा रहे थे। जैसे ही आदिवासी शब्द स्वीकृत हुआ अँग्रेजों ने वनों के अधिकार अपने हाथ में ले लिये। आदिवासी शब्द आते ही वन शब्द चला गया। भीलों की वनों के नैसर्गिक अधिकार की लड़ाई खतम हो गई। वनों का स्वामित्त्व जो भीलों के पास था वह उनसे हट गया और अँग्रेजों हाथ में आ गया। ईसाइयों की भक्ति भी अँग्रेजों में थी इसलिये उन्हों भी वनवासी का अर्थ ज॔गली मानव बताना शुरू कर दिया, आदिवासी को तबज्जो देना शुरू कर दिया। भीलों में लीडरशिप की कमी का फायदा दोनों(ईसाई+अँग्रेज) ने उठाया। आदिवासी शबद आते ही भीलों के वन पर नैसर्गिक अधिकार का प्रमाण चला गया। वनवासी शब्द और वन पर अधिकार दोनों शक्तियाँ भीलों के हाथ से छिन गईं।
ध्यान रखनेवाली बात यह है कि उस समय तक आरएसएस की स्थापना नहीं हुई थी। यह बात कहना इसलिये उल्लेखनीय है कि आज कुछ होग जो अपने आप को भीलों का लीडर समझते हैं वे तर्क देते हैं कि वनवासी शब्द आरएसएस की देन है, पूर्णत: गलत है व अँग्रेजों की चाल है। जो लोग अपने आपको वनवासी कहने में शरमाते हैं उन्हें वनाधिकार प्राप्त करने का कोई हक ही नहीं बचा। अँग्रेजों के आदिवासी तो गिरि कंदराओं में रहनेवाले असभ्य आदिमानवों की संतान हैं।
1860 के लगभग वनवासी भीलों से एक प्रकार से उनका सर्वस्व ही छिन गया। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि वनों के स्वामियों के हाथ से ही वनों का कटवाना चालू हो गया। भीलों के सामने ही उनका घर उजाड़ व वीरान हो गया? शोषण की इन्तिहा तब हो गई जब भीलों को जंगली जानबरों का शिकार करना भी अवैध घोषित कर दिया। सही कहा जाय तो भील पर अँग्रेजों का असली प्रभावपूर्ण शासन वनाधिकार छीन लेने े बाद ही शुरू हुआ।
एक प्रकार से वनवासियों से बड़ी चतुराई पूर्वक उनसे उनका भोजन और भूमि छीन ली गई। अँग्रेजों की इस महालूट के बाद भीलों को पुलिस की यातनाओं का दौर शुरू हुआ। जागीरदार अँग्रेज ईसाई इन तीनों की मिलीभगत से भीलों को चोर लुटेरा, असभ्य, जंगली आदि विविध तमगे दिये गये। फिर इन्हीं शोषक समाज ने इन भीलों को सुधारने का, इनको सुशिक्षित करने के नाम पर इनको इतना बदनाम कर दिया कि भील समाज अपना परिचय देने में भी झिझकने लगा।
समाज सुधारकों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिये यह बताना जरूरी हो गया कि वह भीलों को अधिक से अधिक असभ्य व पिछड़ा बतायें। शोषण का चक्र यहीं पर नहीं रुका आजादी के बाद जो प्रशासन आया वह कानवैंट शिक्षित था, उसने वनवासी तथा भील कहलाना ही बन्द नहीं कराया अपितु भीलों से उनकी एक एक पहचान को उनके असभ्य होने की निशानी बताया जैसे भीली बोली, तीर कामान, पगड़ी, केहड़ (अधोवस्त्र) आदि इन एक एक स्वाभिमान के चिन्ह छीन लिये या बलात् हटवा दिये। अब अपनी जड़ों से कटा आत्मग्लानी से भरा भील अपने समाज की उच्च परम्पराओं के होते हुये भी निरीह , उदास तथा एकांगी ,निराश, हतास दिखाई देता है।
तब का श्रेष्ठ भील समाज आज का दीन हीन आदिवासी के संबोधनों से विभूषित छिपता छिपाता जैेसे तैसे अपनी जिन्दगी जी रहा है। वह सोचता है कि ऐसी क्या प्रक्रिया अपनाऊँ जिससे आज की दुर्निवार्णीय समस्या से निजात पाई जा सके।
भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भील है। भारतीय जनगणना में भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भी भील ही है। आदिवासी शब्द का मतलब भी झाबुआ में भील, भिलाला पटलिया से ही है। जनजाति का भी वही अर्थ है।
1860 के आसपास अँग्रेजों ने भीलों से दो महत्तवपूर्ण शक्तियाँ छीन लीं। भीलों के पास वनों का के स्वामित्त्व का अधिकार था इसलिये उन्हें वनवासी कहते थे, वनों पर भीलों का अधिकर खतम करने के लिये भीलों को वनवासी की जगह अमरीका का शब्द आदिवासी स्थापित करके एक साथ दो काम अँग्जों ने कर।लिये। जब भील अपने आपको वनवासी कहते थे तब तक उनका वनों पर नैसर्गिक अधिकार था, इसी शब्द के चलते अँग्रेज भीलों से वन के अधिकार छीन नहीं पा रहे थे। जैसे ही आदिवासी शब्द स्वीकृत हुआ अँग्रेजों ने वनों के अधिकार अपने हाथ में ले लिये। आदिवासी शब्द आते ही वन शब्द चला गया। भीलों की वनों के नैसर्गिक अधिकार की लड़ाई खतम हो गई। वनों का स्वामित्त्व जो भीलों के पास था वह उनसे हट गया और अँग्रेजों हाथ में आ गया। ईसाइयों की भक्ति भी अँग्रेजों में थी इसलिये उन्हों भी वनवासी का अर्थ ज॔गली मानव बताना शुरू कर दिया, आदिवासी को तबज्जो देना शुरू कर दिया। भीलों में लीडरशिप की कमी का फायदा दोनों(ईसाई+अँग्रेज) ने उठाया। आदिवासी शबद आते ही भीलों के वन पर नैसर्गिक अधिकार का प्रमाण चला गया। वनवासी शब्द और वन पर अधिकार दोनों शक्तियाँ भीलों के हाथ से छिन गईं।
ध्यान रखनेवाली बात यह है कि उस समय तक आरएसएस की स्थापना नहीं हुई थी। यह बात कहना इसलिये उल्लेखनीय है कि आज कुछ होग जो अपने आप को भीलों का लीडर समझते हैं वे तर्क देते हैं कि वनवासी शब्द आरएसएस की देन है, पूर्णत: गलत है व अँग्रेजों की चाल है। जो लोग अपने आपको वनवासी कहने में शरमाते हैं उन्हें वनाधिकार प्राप्त करने का कोई हक ही नहीं बचा। अँग्रेजों के आदिवासी तो गिरि कंदराओं में रहनेवाले असभ्य आदिमानवों की संतान हैं।
1860 के लगभग वनवासी भीलों से एक प्रकार से उनका सर्वस्व ही छिन गया। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि वनों के स्वामियों के हाथ से ही वनों का कटवाना चालू हो गया। भीलों के सामने ही उनका घर उजाड़ व वीरान हो गया? शोषण की इन्तिहा तब हो गई जब भीलों को जंगली जानबरों का शिकार करना भी अवैध घोषित कर दिया। सही कहा जाय तो भील पर अँग्रेजों का असली प्रभावपूर्ण शासन वनाधिकार छीन लेने े बाद ही शुरू हुआ।
एक प्रकार से वनवासियों से बड़ी चतुराई पूर्वक उनसे उनका भोजन और भूमि छीन ली गई। अँग्रेजों की इस महालूट के बाद भीलों को पुलिस की यातनाओं का दौर शुरू हुआ। जागीरदार अँग्रेज ईसाई इन तीनों की मिलीभगत से भीलों को चोर लुटेरा, असभ्य, जंगली आदि विविध तमगे दिये गये। फिर इन्हीं शोषक समाज ने इन भीलों को सुधारने का, इनको सुशिक्षित करने के नाम पर इनको इतना बदनाम कर दिया कि भील समाज अपना परिचय देने में भी झिझकने लगा।
समाज सुधारकों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिये यह बताना जरूरी हो गया कि वह भीलों को अधिक से अधिक असभ्य व पिछड़ा बतायें। शोषण का चक्र यहीं पर नहीं रुका आजादी के बाद जो प्रशासन आया वह कानवैंट शिक्षित था, उसने वनवासी तथा भील कहलाना ही बन्द नहीं कराया अपितु भीलों से उनकी एक एक पहचान को उनके असभ्य होने की निशानी बताया जैसे भीली बोली, तीर कामान, पगड़ी, केहड़ (अधोवस्त्र) आदि इन एक एक स्वाभिमान के चिन्ह छीन लिये या बलात् हटवा दिये। अब अपनी जड़ों से कटा आत्मग्लानी से भरा भील अपने समाज की उच्च परम्पराओं के होते हुये भी निरीह , उदास तथा एकांगी ,निराश, हतास दिखाई देता है।
तब का श्रेष्ठ भील समाज आज का दीन हीन आदिवासी के संबोधनों से विभूषित छिपता छिपाता जैेसे तैसे अपनी जिन्दगी जी रहा है। वह सोचता है कि ऐसी क्या प्रक्रिया अपनाऊँ जिससे आज की दुर्निवार्णीय समस्या से निजात पाई जा सके।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें