शुक्रवार, 30 मार्च 2018

हनुमान जयंती प्रसंग

सही मायने में हनुमान जी उच्च विद्या-विभूषित बल-संपन्न स्फूर्तवान युवक थे, उनकी बुद्धि प्रखर थी तथा वह प्रत्युत्पन्नमति बुद्धि के धनी थे। खतरों से खेलने में वह कदापि नहीं झिझकते थे। आज हनुमान जयंती है इस अवसर पर सबजन हनुमान जी को सही रूप में समझेंगे तो ही हनुमानजी जैसे गुणनिधान महापुरुष भारत वासियों के जीवन को आलोकित करेंगे अन्यथा उनका एक भी गुण कोई गृहण नहीं कर सकता।

आज हनुमान जयंती है। हनुमानजी को लेकर उनके जीवन से संबंधित अनेक भ्रान्तियाँ भारत में प्रचलित हैं उन में से एक दो भ्रान्ति की यहाँँ चर्चा है।

"वह बन्दर थे और पहाड़ उठाकर लाये थे"।

वानर और बन्दर में बहुत अंतर है। वानर नर हैं और बन्दर पशु। संस्कृत में नाम को जानने के अनेक तरीके हैं, उनमैं एक तरीका यह है कि स्थान के नाम से पहचान जैसे नगर र् वन्त दो स्थानों के नाम हैं। नगर के निवासी को नागरिक या नागर कहते हैं। वन के निवासी को वानरिक या वानर कहते हैं।

अयोध्या नगर क्षेत्र है इसलिए राम को नागर कहते थे। नागर या नागरिक प्रचलित नाम हैं। इसी तरह वानर या वानरिक शब्द भी प्रचलित हैं। हनुमान वन निवासी थे। वन के निवासी होने से उन्हें वानर ओर राम को नगर के निवासी होने के कारण नागर कहते थे। नागर और वानर का मेल ही अत्याचार से मुक्ति का कारण बना।

कुछ लोग कहते हैं कि वन में जानवर रहते हैं इसलिए वानर का अर्थ बंदर ही ठीक है। इस कथन पर आप जरा सोचो क्या नगर में जानवर नहीं रहते हैं, जानवर तो नगर में भी रहते हैं। फर्क इतना ही है कि वन की तुलना में नगर में जानवरों की संख्या कम होती है। आज के हिसाब से देखा जाए तो नगरों में ही जानवर अधिक हैं, वनों में तो जानवर बचे ही कहाँ हैं? बहुत कम हो गए हैं।

हनुमान के पिता केसरी थे वह किष्किन्धा राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री थे। केसरी के पिता पद्माकर थे वह अत्यधिक विद्वत्ता के कारण भी प्रसिद्ध थे। हनुमान जी भी उच्चशिक्षित और संस्कारों से परिपूर्ण थे। किष्किन्धा एक बहुत बड़ा राज्य था। उस राज्य की सीमायें नर्मदा तक फैलीं हुईं थीं।

साहित्य में अलंकारों का प्रयोग होता है। साहित्य का आभूषण अलंकार ही होते हैं। अलंकारो के प्रयोग को भावार्थ करते समय सही रूप में समझा या समझाया जाता है। साहित्य में शब्दों के पर्यायवाची भी प्रयुक्त होते हैं, साहित्यिक अज्ञानता के कारण अनेक जगह अर्थ का अनर्थ हुआ है। संदर्भों को सही रूप में नहीं समझा गया है।

हनुमान जी पूँछ रहित बलिष्ठ शरीर के उत्तम ज्ञान संम्पन्न युवा थे। वानर नाम से उल्लिखित वह किसी भी रूप में कोई बन्दर नहीं थे। सग्रीव अंगद, द्विद मयंद, नल, नील , गय, गयंद आदि सभी वनाच्छादित राज्य के सुयोग्य नागरिक थे। साहित्य में प्रवचन की परम्परा ने अज्ञानी प्रवचनकारों ने ऐसी भ्रान्तियों को और अधिक बल दिया। भारत में अधिकांश प्रवचन कार साहित्यिक ज्ञान से अछूते तथा इतिहास के मर्म को न समझनेवाले रहे, यही कारण रहा कि कथाओं में भ्रान्तियाँ पुष्ट होती गयीं।

हनुमान जी पहाड़ उठाकर लाये थे यह भी एक भ्रान्ति ही है। अपने कंधे पर किसी आकार का पत्थर रखकर देखो फिर अंदाज लगाओ कि हनुमान जी द्वारा लाया गया, यदि सही में पहाड़ ही होगा तो वह 25-30 किलो से अधिक बजन का पत्थर नहीं होगा। पहाड़ उठाना भी एक मुहाबरा ही है। उसी अर्थ में इसे समझा जाना था। चमत्कार पहाड़ उठाने में नहीं ,चमत्कार तो यह था कि वे समय रहते जड़ी बूड़ी ले आये, दस पाँच प्रकार की एक जैसी दिखनेवाली जड़ी बूटियों को वह इकट्ठा करके ले आये।

चमत्कार के संदर्भ में बात कही जाये तो धरती का अपनी धुरी पर घूमना एक बहुत बड़ा चमत्कार है पर भारत में धरती के इस तरह घूमने को चमत्कार नहीं माना जाता, कोई व्यक्ति अपने हाथ हिलाकर हाथ की सफाई से कुछ वस्तु निकाल दे तो उसे चमत्कार माना जाता है। भारत में अच्छाइयाँ हैं पर अज्ञानता भी कूट कूट कर भरी हुई है। अभी भी भारत में हर जगह अज्ञानता का साम्राज्य फैला हुआ है। विदेशों से आनेवाले यात्रियों ने भारत की अच्छी बुरी दोनों बातों का उल्लेख किया है।

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