बुधवार, 18 अप्रैल 2018

परशुराम जयंती भुज बल भूमि भूप बिनु कीन्हीं

यह त्रेता युग के एक महापुरुष की कहानी है। तब की समाजिक व्यवस्था में और आज की सामाजिक व्यवस्था में बहुत बदलाव हो गया है। तब की घटनाओं के संदर्भ, आज के संदर्भों से बिल्कुल अलग थे। तब वर्ण व्यवस्था थी और जाति व्यवसथा कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं थी। ब्राह्मण पुत्र रावण, ब्राह्मण से मृत्युपर्यंत क्षत्रिय बनने के लिये प्रयासरत रहा पर वह क्षत्रिय नहीं बन सका।

महामुनि विश्वामित्र को क्षत्रिय से ब्राह्मण बनने के लिये तप तपस्या की अनेक चुनौतियों को पार करना पड़ा, तब कहीं जाकर उन्हें ब्रह्मत्त्व प्राप्त हुआ। मैं आपको यही बता रहा था कि परशुराम जब के हैं तब समाज अलग तरह का था, आज के संदर्भों को सुनकर त्रेता युगवाले भौंचक रह जायेंगे, ठीक बैसे ही जैसे हम लोग त्रेता युग की बातों को सुनकर दाँतों तले उँगली दबाते हैं।

हाँ तो, यह बात बहुत पुराने जमाने की है, तब आज के जैसी कोर्ट कचहरीं नहीं हुआ करती थीं, तब की न्याय व्यवस्था में न्याय की देवी आँखों पर पट्टी नहीं बाँधती थी। तब की न्याय व्यवस्था में नकली गवाहों को भी उतनी ही सजा दी जाती थी कि जितनी मुख्य अपराधी को। तब अपने पराये का मोह नहीं था और न जातियाँ थीं न आज जैसा जातिवाद का बोलवाला। तब सामाजिक भरोसा तोड़ना भी बड़ा अपराध था।

यह तब की बात है, आज के संदर्भों से इसे समझने की कोशिश न करो। तब इन्होंने उन परिस्थितियों में कैसी भूमिका निभाई, यह संदेश लेने के लिये जरूरी बात है। परिस्थितियाँ जरूर बदली हैं पर भूमिकायें आज भी हैं। अन्याय से लड़ने की, अपने आपको खपाने की, दुनियाँ को निर्भय बनाने की, मौका हाथ से नहीं जाने देने की। परशुराम एक युगान्तरकारी व्यक्तित्त्व का, सूर्य सा चमकता नाम है।

अब राजसिंहासन नहीं हैं। राजसिहासनों को बदलने की बात तो बहुत आगे की बात है, राजसिहासनों को बदलने की सोचने पर भी पसीना आ जाता था। तब महा प्रतापी शूरवीर परशुराम ने ऐय्याशी में डूबे अनाचार और अत्याचार के पर्यायवाची राजाओं के आतंक से धरती को 21 बार मुक्त किया था। उन राजसिहासनों पर उनके उचित उत्तराधिकारियों को बैठाया था। अंतिम बार उन्होंने उस समय के सबसे उत्तम पुरुष राम को गद्दी सोंपी और स्वयं पूर्वदिशा में स्थित महेन्द्र पर्वत पर तप करने चले गये थे।

अनाचार और अत्याचार जिनकी भनक से भागता था ऐसे बज्रबली थे परशुराम। अक्षय तृतिया उनका जनम दिन है। जनश्रुति है कि इन्दौर मुम्बई के मार्ग पर लगभग 50-60 किलोमीटर दूर जानापाव की पहाड़ी जमदग्नि ऋषि का निवास था, उनकी एक संतान परशुराम थे। आदर और श्रद्धा से भरे हम जैसे अनेकानेक लोग उन्हें भगवान परशुराम नाम से संबोधित करते हैं। आज उनका स्मरण हमें हमारी राह पर द्रुत गति से चलने के लिये प्रेरित करेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें