सोमवार, 18 अप्रैल 2016

महावीर जयन्ती:ओशो


अगर मैं महावीर को प्रेम करता हूं तो वे मुझे कपड़े पहने मिल जाएं तो भी मैं प्रेम करूंगा और वे नंगे मिल जाएं तो भी प्रेम करूंगा। लेकिन एक अनुयायी है, वह कहता है कि महावीर नग्न हैं, तो ही मैं प्रेम करूंगा! अगर वे नग्न नहीं हैं तो अज्ञानी हैं!
एक घटना घटी, मेरी एक मित्र, एक महिला हालैंड गई थी। वहां कृष्णमूर्ति का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन था, कोई छह-सात हजार लोग सारी दुनिया से इकट्ठे थे कृष्णमूर्ति को सुनने। वह मेरी परिचित महिला एक दुकान पर सांझ को गई है, उसके साथ दो और यूरोपियन महिलाएं थीं। वे तीनों एक छोटी सी दुकान पर कुछ खरीदने गई हैं।
वहां देख कर वे हैरान रह गई हैं, क्योंकि कृष्णमूर्ति वहां टाई खरीद रहे हैं! और न केवल टाई–एक तो यही बात बड़ी गलत मालूम पड़ी कि कृष्णमूर्ति जैसा ज्ञानी एक साधारण दुकान पर टाई खरीदता हो! तो ज्ञानी तो खतम ही हो गया उसी क्षण। और फिर न केवल टाई खरीद रहे हैं, बल्कि यह टाई लगा कर देखते हैं, वह टाई लगा कर देखते हैं; यह भी पसंद नहीं पड़ती, वह भी पसंद नहीं पड़ती! सारी दुकान की टाई फैला रखी हैं।
तो वे तीनों महिलाओं के मन में बड़ा संदेह भर गया कि हम किस व्यक्ति को सुनने इतनी दूर से आए हैं! और वह व्यक्ति एक साधारण सी दुकान पर टाई खरीद रहा है! और वह भी टाई में भी रंग मिला रहा है कि कौन सा मेल खाता है, कौन सा नहीं मेल खाता है!
उन दो यूरोपियन महिलाओं ने मेरी उस मित्र को कहा कि हम तो अब सुनने नहीं आएंगे। बात खतम हो गई है। एक साधारण आदमी को सुनने हम इतने दूर से व्यर्थ परेशान हुए। जिसको अभी कपड़ों का भी खयाल है इतना ज्यादा, उसको क्या ज्ञान मिला होगा! वे दोनों महिलाएं सम्मेलन में सम्मिलित हुए बिना वापस लौट गईं।
उस मेरी मित्र ने कृष्णमूर्ति को जाकर कहा कि आपको पता नहीं है कि आपके टाई खरीदने से कितना नुकसान हुआ! दो महिलाएं सम्मेलन छोड़ कर चली गई हैं, क्योंकि वे यह नहीं मान सकतीं कि एक ज्ञानी व्यक्ति और टाई खरीदता हो। तो कृष्णमूर्ति ने कहा कि चलो, दो का मुझसे छुटकारा हुआ, यह भी क्या कम है! दो मुझसे मुक्त हो गईं, यह भी क्या कम है! दो का भ्रम टूटा, यह भी क्या कम है! कृष्णमूर्ति ने कहा, क्या मैं टाई न खरीदूं तो ज्ञानी हो जाऊंगा? अगर ज्ञानी होने की इतनी सस्ती शर्त है तो कोई भी नासमझ इसे पूरी कर सकता है। अगर इतनी सस्ती शर्त से कोई ज्ञानी हो जाता है तो कोई भी नासमझ इसे पूरी कर सकता है। लेकिन इतनी सस्ती शर्त पर मैं ज्ञानी नहीं होना चाहता। और इतनी सस्ती शर्त पर जो मुझे ज्ञानी मानने को तैयार हैं, वे न मानें, यही अच्छा है, यही शुभ है।
लेकिन हम सबकी ऐसी शर्तें होती हैं। और शर्तें इसीलिए होती हैं कि हमारा कोई प्रेम नहीं है। हमारी अपनी धारणाएं हैं, उन धारणाओं पर हम कसने की कोशिश करते हैं एक आदमी को! और ध्यान रहे, जितना अदभुत व्यक्ति होगा, उतनी ही सारी धारणाओं को तोड़ देता है; किसी धारणा पर कसा नहीं जा सकता। असल में अदभुत व्यक्ति का अर्थ ही यह है कि पुरानी कसौटियां उस पर काम नहीं करतीं। अदभुत व्यक्ति, प्रतिभाशाली व्यक्ति न केवल खुद को निर्मित करता है बल्कि खुद को मापे जाने की कसौटियां भी फिर से निर्मित करता है।
और इसीलिए ऐसा हो जाता है कि महावीर जब पैदा होते हैं तो पुराने महापुरुषों के अनुयायी महावीर को नहीं पहचान पाते। क्योंकि उनकी कसौटियां जो रहती हैं, वे महावीर पर लागू नहीं पड़तीं। पुराना जो अनुयायी है, पुराने महापुरुषों का; वह पुरानी उन महापुरुषों के हिसाब से उसने धारणाएं बना कर रखी हैं, वह महावीर पर कसने की कोशिश करता है! महावीर उस पर नहीं उतर पाते, इसलिए व्यर्थ हो जाते हैं। लेकिन महावीर का अनुयायी वही बातें बुद्ध पर कसने की कोशिश करता है, और तब फिर मुश्किल हो जाती है।
हमारा चित्त अगर पूर्वाग्रह से भरा है तो महापुरुष तो दूर, एक छोटे से व्यक्ति को भी हम प्रेम करने में समर्थ नहीं हो पाते। एक पत्नी पति को प्रेम नहीं कर पाती, क्योंकि पति कैसा होना चाहिए, इसकी धारणा पक्की मजबूत है! एक पति पत्नी को प्रेम नहीं कर पाता, क्योंकि पत्नी कैसी होनी चाहिए, शास्त्रों से सब उसने सीख कर तैयार कर लिया है, वही अपेक्षा कर रहा है! वह इस व्यक्ति को जो सामने पत्नी या पति की तरह मौजूद है, देख ही नहीं रहा है। और ऐसा व्यक्ति कभी हुआ ही नहीं है। यह बिलकुल नया व्यक्ति है।
मैंने जो बातें महावीर के संबंध में कहीं, उन पर मेरा कोई पूर्व आग्रह नहीं है। कोई सूचनाओं के, किन्हीं धारणाओं के, किन्हीं मापदंडों के आधार पर मैंने उन्हें नहीं कसा है। मेरे प्रेम में वे जैसे दिखाई पड़ते हैं, वैसी मैंने बात की है। और जरूरी नहीं है कि मेरे प्रेम में वे जैसे दिखाई पड़ते हैं वैसे आपके प्रेम में भी दिखाई पड़ने चाहिए। अगर वैसा भी मैं आग्रह करूं, तो फिर मैं आपसे धारणाओं की अपेक्षा कर रहा हूं। मैंने अपनी बात कही, जैसा वे मुझे दिखाई पड़ते हैं, जैसा मैं उन्हें देख पाता हूं।
और इसलिए एक बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी होगी–यह बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी होगी कि महावीर के संबंध में जो भी मैंने कहा है, वह मैंने कहा है और मैं उसमें अनिवार्यरूप से उतना ही मौजूद हूं, जितने महावीर मौजूद हैं। वह मेरे और महावीर के बीच हुआ लेन-देन है। उसमें अकेले महावीर नहीं हैं, उसमें अकेला मैं भी नहीं हूं, उसमें हम दोनों हैं। और इसलिए यह बिलकुल ही असंभव है कि जो मैंने कहा है, ठीक बिलकुल वैसा ही किसी दूसरे को भी दिखाई पड़े। यह बिलकुल असंभव है। मैं किसी आब्जेक्टिव महावीर की, किसी दूर वस्तु की तरह खड़े हुए व्यक्ति की बात नहीं कर रहा हूं। मैं तो उस महावीर की बात कर रहा हूं, जिसमें मैं भी सम्मिलित हो गया हूं, जो मेरे लिए एक सब्जेक्टिव अनुभव है, एक आत्मगत अनुभूति बन गया है। इसलिए बहुत सी कठिनाइयां होंगी।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

गाँव की समृद्धि का मार्ग

कल चैत्र शुक्लनवमीं, १४/०४/२०१६ दशरथ के घर अयोध्या में राम का जन्म दिन था। राम के जीवन के अनेकों प्रेरक प्रसंग हैं। एक से अधिक विवाह व्यक्ति के जीवन में ईर्ष्या, वैमनस्य को जन्म देते हैं। राम के जीवन में भी ऐसा ही हुआ।


उन्हें वनवास हुआ। राम ने बिना आनाकानी किये कैकेयी के प्रस्ताव और पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। घर टूटने से बचाने का उनका दृष्टिकोण बे-जोड़ रहा।


जब भरत राम से मिलने आये तो लक्ष्मन के मन में भरत के प्रति बहुत अधिक क्षोभ था। लक्ष्मण ने भरत से युद्ध करने का विचार राम के सामने रखा। राम ने लक्ष्मण के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया। भरत और लक्ष्मण के बीच की खाई को दूर किया।


लक्ष्मण के कहने पर ही राम भरत से चित्रकूट में मिले। लक्ष्मण
के मन में भरत के प्रति संदेह था, राम ने लक्ष्मण को समझाया कि भरत कैकेयी के विचारों से कोई मेल नहीं है भरत निष्कपट हैं। दो भाइयों के बीच की संदेहात्मक खाई को दूर करने का राम का तरीका अद्भुत एवं अनुपम सिद्ध हुआ।


इन्द्र-पुत्र जयन्त को राम ने सख्त सजा दी और अय्याशी में पले-बढ़े, बिगड़े राजकुमारों की अनर्गल हरकतों पर जबरदस्त लगाम कस दी थी।


राम ने भयभीत समाज को निर्भय बनाया। आज की भाषा में कहा जाये तो कहा जायेगा कि राम ने जंल में निवास रत लोगों के हक की लड़ाई लड़ी। स्त्रियों के प्रति दुर्व्वहार करनेवालों को राम ने कभी नहीं बख्शा चाहे वह व्यक्ति तब का अवध्य ब्राह्मणही क्यों न हो।


चौदह वर्ष के वनवास में लक्ष्मण और सीता के बीच भी खाई पैदा हो गई थी और राम ने लक्ष्मण के पक्ष को जान कर उस विषय को सदा सदा के लिये समाप्त किया।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

जैन : इतिहास का एक पन्ना


श्रवणबेलगोला से मिले शिलालेखों के अनुसार, चंद्रगुप्त अपने अंतिम दिनों में जैन-मुनि हो गए। चन्द्र-गुप्त अंतिम मुकुट-धारी मुनि हुए, उनके बाद और कोई मुकुट-धारी (शासक) दिगंबर-मुनि नही हुए। अतः चन्द्र-गुप्त का जैन धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। स्वामी भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोल चले गए। वहीं उन्होंने उपवास (संथारा) द्वारा शरीर त्याग किया। श्रवणबेलगोल में जिस पहाड़ी पर वे रहते थे, उसका नाम चंद्रगिरि है और वहीं उनका बनवाया हुआ 'चंद्रगुप्तबस्ति' नामक मंदिर भी है।

राम नवमी : राम जन्म


राम के जीवन को आदर्श मानकर जीवन जीने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं। राम का विरोध करनवाले भी हैं। राम के पक्ष और विपक्ष में रहनेवाले लोग, सीता हरण के पश्चात सीता को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास से सरोकार नहीं रखते।
पिता, पुत्र, भाई, राजा, शिष्य आदि अनेक जिम्मेदारियों को आदर्श मानते हैं, बताते भी हैं पर उनमें से यदि किसी की पत्नि का अपहरण हो जाये तो पत्नि को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास का अनुसरण नहीं करते।
अपनी पत्नि को पुनः प्राप्त करने का प्रयास झाबुआ के भील करते हैं। झाबुआ में भीलों के इस प्रकार के प्रयास सराहनीय माने जाना चाहिये पर इतर रामभक्त लोग भीलों के इस प्रयास की निन्दा करते देखे जा सकते हैं। सीता को घर में पूर्ववत स्थान मिलने को लेकर अयोध्या के धोबी बन जाने को आतुर यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान हैं।
राम ने नारी के सम्मान में अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ी पर तथाकथित सभ्य समाज की स्त्री के प्रति ढीटता के समक्ष राम अवश्य हार गये। आज भी अयोध्या में राम कम और स्त्री को लेकर टीका टिप्पणी करनेवाले धोबी और उन धोबियों के समर्थक आज भी कम नहीं है। सीता परित्याग के कारुणिक दृश्यों पर आँसू बहाना मानवीय जीवन मूल्यों की ऊँचाई को रेखांकित नहीं करता। निस्संदेह राम सीता महान हो सकते हैं पर उस समय के घटनाचक्र समाज की निकृष्टता के अनुपम उदाहरण हैं। उस त्रेतायुग से तो आज का कलियुग बहुत अच्छा है।
झाबुआ के जनजाति समाज के लोग नारी के प्रति परित्याग जैसा दुर्व्यवहार करते कभी नहीं दिखते। नारी का परित्याग करना यहाँ अच्छा नहीं माना जाता। राम के जीवन के अनेक उत्कृष्ट पहलुओं को अपने जीवन का अंग बनाये रखनेवाले भील आज भी स्वघोषित सभ्य समाज के सम्मान से दूर हैं व एकाकी हैं।
तत्कालीन समय में अन्याय के प्रतिकार में सदैव उद्यत तथा न्याय का साथ निभाने वाले भीलों का अनुगमन राम ने ही किया होगा। भले ही शिव या सूर्य के अवतार हों पर हनुमान, सुग्रीव आदि वन के श्रेष्ठ नर वानर भील ही थे। आंशिक रूप में ही सही पर आज भी हनुमान जैसा साहसिक गुण और सुग्रीव जैसी लंपटता यदा-कदा वनांचल में दिखाई दे जाती है।