मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

राम नवमी : राम जन्म


राम के जीवन को आदर्श मानकर जीवन जीने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं। राम का विरोध करनवाले भी हैं। राम के पक्ष और विपक्ष में रहनेवाले लोग, सीता हरण के पश्चात सीता को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास से सरोकार नहीं रखते।
पिता, पुत्र, भाई, राजा, शिष्य आदि अनेक जिम्मेदारियों को आदर्श मानते हैं, बताते भी हैं पर उनमें से यदि किसी की पत्नि का अपहरण हो जाये तो पत्नि को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास का अनुसरण नहीं करते।
अपनी पत्नि को पुनः प्राप्त करने का प्रयास झाबुआ के भील करते हैं। झाबुआ में भीलों के इस प्रकार के प्रयास सराहनीय माने जाना चाहिये पर इतर रामभक्त लोग भीलों के इस प्रयास की निन्दा करते देखे जा सकते हैं। सीता को घर में पूर्ववत स्थान मिलने को लेकर अयोध्या के धोबी बन जाने को आतुर यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान हैं।
राम ने नारी के सम्मान में अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ी पर तथाकथित सभ्य समाज की स्त्री के प्रति ढीटता के समक्ष राम अवश्य हार गये। आज भी अयोध्या में राम कम और स्त्री को लेकर टीका टिप्पणी करनेवाले धोबी और उन धोबियों के समर्थक आज भी कम नहीं है। सीता परित्याग के कारुणिक दृश्यों पर आँसू बहाना मानवीय जीवन मूल्यों की ऊँचाई को रेखांकित नहीं करता। निस्संदेह राम सीता महान हो सकते हैं पर उस समय के घटनाचक्र समाज की निकृष्टता के अनुपम उदाहरण हैं। उस त्रेतायुग से तो आज का कलियुग बहुत अच्छा है।
झाबुआ के जनजाति समाज के लोग नारी के प्रति परित्याग जैसा दुर्व्यवहार करते कभी नहीं दिखते। नारी का परित्याग करना यहाँ अच्छा नहीं माना जाता। राम के जीवन के अनेक उत्कृष्ट पहलुओं को अपने जीवन का अंग बनाये रखनेवाले भील आज भी स्वघोषित सभ्य समाज के सम्मान से दूर हैं व एकाकी हैं।
तत्कालीन समय में अन्याय के प्रतिकार में सदैव उद्यत तथा न्याय का साथ निभाने वाले भीलों का अनुगमन राम ने ही किया होगा। भले ही शिव या सूर्य के अवतार हों पर हनुमान, सुग्रीव आदि वन के श्रेष्ठ नर वानर भील ही थे। आंशिक रूप में ही सही पर आज भी हनुमान जैसा साहसिक गुण और सुग्रीव जैसी लंपटता यदा-कदा वनांचल में दिखाई दे जाती है।

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