जैसे-जैसे ताकत बढ़ती है और अपनी कल्पना को साकार स्वरूप देने की क्षमता बढ़ती है, साधन उपलब्ध होने लगते हैं तो योजनाओं बनने लगती हैं। प्लानिंग होती है। कल का वह गरीब आदमी कुछ करता नजर आता है। मानो वह सोचता हो कि उसका घर होगा। उसके कमरे कितने होंगे, आर्किटेक्ट कौन होगा आदि प्रश्न उसके मन में आने लगते हैं। जैसे जैसे हैसियत बढ़ती है यह सब होता ही है।
उदाहरण के लिये यदि चित्रकार है तो उसके चित्र के रंग उभरने लगते हैं। चित्र की कल्पना नयी नहीं होती। चित्र वही है परन्तु क्या वह सब रंग एक साथ भरता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। पहले वह आउटलाइन खींचता है। क्या कोई ऐसा कहेगा कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ नहीं है, सो बात नहीं। धीरे-धीरे कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट कहा गया है, बैसा होता है।
सबेरे चार बजे हम अपनी खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो सामने का वृक्ष का अंधेरे में दिखाई देता है; परन्तु साफ नहीं। धीरे-धीरे प्रकाश फैलता। वृक्ष स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वृक्ष वही है। कोई ऐसा नहीं कहा सकता कि नया वृक्ष उग आया। पहले जो नहीं था बैसा एकाएक हो गया, सो बात नहीं। पेड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । बस प्रकाश अधिक होने से डाली, पत्ते, फूल सभी कुछ दिखाई देने लगे हैं। अनफोल्डमेंट का मतलब यही है, कि चीज वही है फिर भी उसका दर्शन क्रमश: होने लगा।
इसी प्रकार ध्येय साकार होता है। कुछ सिद्धान्तों पर आधारित ध्येय लेकर हम प्रारंभ करते हैं। जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है यह प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट होता है। यह आवश्यक भी है । बिना शक्ति के जिस कल्पना को पागलपन करार दिया जाता है वही अब बुद्धिमानी मानी जाती है । इसलिये क्षमता बढ़ने के साथ साथ कल्पना साकार होना ठीक है ।
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उक्त विचार दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के हैं
उदाहरण के लिये यदि चित्रकार है तो उसके चित्र के रंग उभरने लगते हैं। चित्र की कल्पना नयी नहीं होती। चित्र वही है परन्तु क्या वह सब रंग एक साथ भरता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। पहले वह आउटलाइन खींचता है। क्या कोई ऐसा कहेगा कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ नहीं है, सो बात नहीं। धीरे-धीरे कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट कहा गया है, बैसा होता है।
सबेरे चार बजे हम अपनी खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो सामने का वृक्ष का अंधेरे में दिखाई देता है; परन्तु साफ नहीं। धीरे-धीरे प्रकाश फैलता। वृक्ष स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वृक्ष वही है। कोई ऐसा नहीं कहा सकता कि नया वृक्ष उग आया। पहले जो नहीं था बैसा एकाएक हो गया, सो बात नहीं। पेड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । बस प्रकाश अधिक होने से डाली, पत्ते, फूल सभी कुछ दिखाई देने लगे हैं। अनफोल्डमेंट का मतलब यही है, कि चीज वही है फिर भी उसका दर्शन क्रमश: होने लगा।
इसी प्रकार ध्येय साकार होता है। कुछ सिद्धान्तों पर आधारित ध्येय लेकर हम प्रारंभ करते हैं। जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है यह प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट होता है। यह आवश्यक भी है । बिना शक्ति के जिस कल्पना को पागलपन करार दिया जाता है वही अब बुद्धिमानी मानी जाती है । इसलिये क्षमता बढ़ने के साथ साथ कल्पना साकार होना ठीक है ।
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उक्त विचार दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के हैं
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