स्वास्थ्य को लेकर सरकार की पहल सराहनीय हो गई है, जगह जगह एम्बुलेंस सजगता के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। पुलिस विभाग भी कुछ अर्से से सजग व चौकन्ना हो गया है। प्रधानमंत्री सड़कों ने क्रान्ति लादी है। स्कूल चलो अभियान सफलता के शिखर छू रहा है। इसके बावजूद भी अनेक समस्यायें रुकावट बनकर खड़ी हैं। लोकतन्त्र की आवाज धरने प्रदर्शन लगभग न के बराबर हैं। ऐसा तो नहीं हो रहा कि कहीं हम अपनी ही गुलामी की दिशा में आगे बढ़ रहे हों?
ठंड की रातों में रात में दो बजे स्टेशन पर पर कोई भूली बिसरी आवाज चाय गर्म. .... की तरह अब धरने और प्रदर्शन लगभग मन्द से हो गये हैं, ऐसे कानून बन गये हैं कि धरना देना अपराध सा हो गया है। धरना देना है तो किसी एक कोने में स्थान निश्चित है, जैसे दिल्ली में जन्तर मन्तर, भोपाल में जहांगीराबाद के पास।
धरना लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम होता है। सड़क तो रोक ही नहीं सकते। प्रदर्शन भी न के बराबर हैं। सरकार ताकतवर होती जा रही हैं! जनता की ताकत घटती जा रही है। जनता की बनाई सरकार पर जनता का नियंत्रण घटता जा रहा है। ऐसे कभी नहीं होगा कि सरकार अपनी दम पर सदा आदर्श बनी रहे, घोड़े की लगाम की तरह सरकार पर चौकसी, जनता को सदैव सजग रहना होगा, चाबुक दिखाने के लिये भी हो और मारने के लिये भी।
सरकार बनीं रहेगी, संचालन करनेवाले दल बदलते रहेंगे।सभी नागरिक के नाते सोचें कि कहीं जाने अनजाने हम अपने ही बनाये जाल में तो नहीं उलझते जा रहें हैं? कुछ बातें स्मरणीय, चिंतनीय हैं:-
राजनैतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति का काकस तो नहीं बन रहा है। जनता के साथ घुलमिल कर काम करनेवाले विपक्षी दल भी कमजोर तो नहीं हो रहे हैं। जनता के जागृत लोग अपनी संख्या में बढ़ रहे हैं कि नहीं, जीवित जागृत समाज लोकतंत्र का असली प्रहरी है।
माही-नर्मदा क्षेत्र (अपना क्षेत्र::आलीराजपुर+झाबुआ)
झाबुआ और आलीराजपुर दो जिलों की जनसंख्या अब बीस लाख के पार हो गई है। इसमें 88% (17,60,000) लोग गरीब कर्जदार, अभावग्रस्त हैं। अर्थात ढाई लाख से अधिक परिवार। इन ढाई लाख परिवारों का दुख जानने का का कोई सिस्टम बनाया गया है क्या? वह सिस्टम कहीं फैल हो जाये तो उसे ठीक कैसे किया जायेगा, ठीक कौन करेगा? यह ज्वलंत प्रश्न है।
12% (24000) लोग अर्थात लगभग 35 हजार परिवार कर्जदार नहीं हैं, अभावग्रस्त भी नहीं हैं, समपन्न हैं, सम्पन्न परिवारों की भी समस्यायें हैं, इनकी समस्याओं के समाधान में सामाजिक संस्थायें, पत्र, पत्रकार, राजनैतिक दल, सरकारी तंत्र ही सक्रिय हैं। अभी में देख रहा हूँ कि गाँवों के साथ जिला केन्द्र पर बिजली कभी भी किसी भी समय चली जाती है। गाँव में क्या हाल हैं, वर्षाकाल में यह स्थिति है। जबकि इस समय बिजली की खपत बहुत कम है। बिजली विभाग सही काम करे, किसकी जवाबदारी है ?
कृषि प्रधान जिले में कृषि विभाग क्या कर रहा है? आलीराजपुर+झाबुआ जहाँ 14 लाख पशु रहते हैं, उन दोनों जिलों में पशुचिकित्सालय हैं भी कि नहीं यह देखना किसका काम हैं? पशु चिकित्सा में ये दोनों जिले अत्यधिक पिछड़े हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जिन्दा है या मर गया है किससे पूछें? साढ़े तीन लाख विद्यार्थी जिस जगह पढ़ते हों उन दोनों जिलों के शिक्षक किस हालत में हैं उनका सुख दुख जानने के लिये क्या करें? उनका शैक्षणिक प्रशिक्षण सही चलता है कि नहीं, कौन जिम्मेदार है?
इण्टरनेट सेटेलाइट से जहाँ तालाबों की प्रचुर संख्या का पता चल जाता हो वहाँ स्टाप डैम में सही समय पर रिपेयर होकर गेट लग जायें , कौन सा विभाग इसके लिये जिम्मेदारी वहन कर रहा है? कहीं सरकारी विभाग आपसी खींचतान में तो नहीं उलझ गये? पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या जनपद और जिला परिषद अपना काम सही ढंग से कर पा रहीं हैं? सांसद, विधायक लोकप्रतिनिधि के रूप में काम कर पा रहे हैं? जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी ताकत कहाँ लग रही है?
देश का प्रधानमंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी अपनी सरकारी मशीनरी को स्मूथ चलाने के लिये अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को क्या सक्षम बना चुके हैं या सक्षम बना रहें हैं ? विपक्षी दल ठीक से काम करे, इसकी फिकर में कौन है? लोकतंत्र में जनता सजगता दिखाये तो इस सजगता को समझने के लिये सत्तापक्ष की तरफ से कौन नियुक्त है?
स्वतन्त्रता दिवस एक दिन के लिये मनाना ठीक है पर जरूरत है इसे एक मास तक आत्मविश्लेषण के रूप में मनाने की। सरकारी तंत्र , सामाजिक संस्थायें, सांस्कृतिक संगठन, राजनैतिक दल, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्र-पत्रकार मिलकर साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आत्मविश्लेषण द्वारा इस तरह के प्रयास करें जिससे लोकतंत्र अपनी कसौटी पर सही रहे व हमेशा खरा उतरे।
70 वें स्वतन्त्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना?
ठंड की रातों में रात में दो बजे स्टेशन पर पर कोई भूली बिसरी आवाज चाय गर्म. .... की तरह अब धरने और प्रदर्शन लगभग मन्द से हो गये हैं, ऐसे कानून बन गये हैं कि धरना देना अपराध सा हो गया है। धरना देना है तो किसी एक कोने में स्थान निश्चित है, जैसे दिल्ली में जन्तर मन्तर, भोपाल में जहांगीराबाद के पास।
धरना लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम होता है। सड़क तो रोक ही नहीं सकते। प्रदर्शन भी न के बराबर हैं। सरकार ताकतवर होती जा रही हैं! जनता की ताकत घटती जा रही है। जनता की बनाई सरकार पर जनता का नियंत्रण घटता जा रहा है। ऐसे कभी नहीं होगा कि सरकार अपनी दम पर सदा आदर्श बनी रहे, घोड़े की लगाम की तरह सरकार पर चौकसी, जनता को सदैव सजग रहना होगा, चाबुक दिखाने के लिये भी हो और मारने के लिये भी।
सरकार बनीं रहेगी, संचालन करनेवाले दल बदलते रहेंगे।सभी नागरिक के नाते सोचें कि कहीं जाने अनजाने हम अपने ही बनाये जाल में तो नहीं उलझते जा रहें हैं? कुछ बातें स्मरणीय, चिंतनीय हैं:-
राजनैतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति का काकस तो नहीं बन रहा है। जनता के साथ घुलमिल कर काम करनेवाले विपक्षी दल भी कमजोर तो नहीं हो रहे हैं। जनता के जागृत लोग अपनी संख्या में बढ़ रहे हैं कि नहीं, जीवित जागृत समाज लोकतंत्र का असली प्रहरी है।
माही-नर्मदा क्षेत्र (अपना क्षेत्र::आलीराजपुर+झाबुआ)
झाबुआ और आलीराजपुर दो जिलों की जनसंख्या अब बीस लाख के पार हो गई है। इसमें 88% (17,60,000) लोग गरीब कर्जदार, अभावग्रस्त हैं। अर्थात ढाई लाख से अधिक परिवार। इन ढाई लाख परिवारों का दुख जानने का का कोई सिस्टम बनाया गया है क्या? वह सिस्टम कहीं फैल हो जाये तो उसे ठीक कैसे किया जायेगा, ठीक कौन करेगा? यह ज्वलंत प्रश्न है।
12% (24000) लोग अर्थात लगभग 35 हजार परिवार कर्जदार नहीं हैं, अभावग्रस्त भी नहीं हैं, समपन्न हैं, सम्पन्न परिवारों की भी समस्यायें हैं, इनकी समस्याओं के समाधान में सामाजिक संस्थायें, पत्र, पत्रकार, राजनैतिक दल, सरकारी तंत्र ही सक्रिय हैं। अभी में देख रहा हूँ कि गाँवों के साथ जिला केन्द्र पर बिजली कभी भी किसी भी समय चली जाती है। गाँव में क्या हाल हैं, वर्षाकाल में यह स्थिति है। जबकि इस समय बिजली की खपत बहुत कम है। बिजली विभाग सही काम करे, किसकी जवाबदारी है ?
कृषि प्रधान जिले में कृषि विभाग क्या कर रहा है? आलीराजपुर+झाबुआ जहाँ 14 लाख पशु रहते हैं, उन दोनों जिलों में पशुचिकित्सालय हैं भी कि नहीं यह देखना किसका काम हैं? पशु चिकित्सा में ये दोनों जिले अत्यधिक पिछड़े हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जिन्दा है या मर गया है किससे पूछें? साढ़े तीन लाख विद्यार्थी जिस जगह पढ़ते हों उन दोनों जिलों के शिक्षक किस हालत में हैं उनका सुख दुख जानने के लिये क्या करें? उनका शैक्षणिक प्रशिक्षण सही चलता है कि नहीं, कौन जिम्मेदार है?
इण्टरनेट सेटेलाइट से जहाँ तालाबों की प्रचुर संख्या का पता चल जाता हो वहाँ स्टाप डैम में सही समय पर रिपेयर होकर गेट लग जायें , कौन सा विभाग इसके लिये जिम्मेदारी वहन कर रहा है? कहीं सरकारी विभाग आपसी खींचतान में तो नहीं उलझ गये? पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या जनपद और जिला परिषद अपना काम सही ढंग से कर पा रहीं हैं? सांसद, विधायक लोकप्रतिनिधि के रूप में काम कर पा रहे हैं? जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी ताकत कहाँ लग रही है?
देश का प्रधानमंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी अपनी सरकारी मशीनरी को स्मूथ चलाने के लिये अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को क्या सक्षम बना चुके हैं या सक्षम बना रहें हैं ? विपक्षी दल ठीक से काम करे, इसकी फिकर में कौन है? लोकतंत्र में जनता सजगता दिखाये तो इस सजगता को समझने के लिये सत्तापक्ष की तरफ से कौन नियुक्त है?
स्वतन्त्रता दिवस एक दिन के लिये मनाना ठीक है पर जरूरत है इसे एक मास तक आत्मविश्लेषण के रूप में मनाने की। सरकारी तंत्र , सामाजिक संस्थायें, सांस्कृतिक संगठन, राजनैतिक दल, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्र-पत्रकार मिलकर साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आत्मविश्लेषण द्वारा इस तरह के प्रयास करें जिससे लोकतंत्र अपनी कसौटी पर सही रहे व हमेशा खरा उतरे।
70 वें स्वतन्त्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना?
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