मंगलवार, 11 जुलाई 2017

विशाल मन का समाज::झबुआ के संस्मरण

मैं और मेरे एक मित्र पहली बार साकड़ी की तरफ से खाम्बा, भिताड़ा गए। साकड़ी के कुछ लोगों ने हमें वहाँ न जाने का सुझाव दिया पर हम चल दिये। दुर्गम अनजान रास्ता था। एक घंटा चढ़ाई चढ़ने के बाद हम दो राहे पर रुक गए। दूर दूर तक कोई व्यक्ति वहाँ दिखाई न दिया। छोटी छोटी पगडंडी बनी थीं। वह जगह साकड़ी और खाम्बा की सीमा पर थी। हमने दिशा का अंदाज लगाया और एक पगडंडी पकड़ पर अपने पग बढ़ा दिए। ऊँची चढ़ाई चढ़ने के बाद वह उतार का मार्ग था। बहुत घना जंगल था, दो घंटे पैदल चलने के बाद भी उस रास्ते  पर हमें एक भी व्यक्ति उस रास्ते पर नहीं मिला। बहुत खोजने के बाद भी खाम्बा गाँव हमें नहीं मिल सका पर हम खाम्बा की जगह बोरवाला गाँव में पहुँच गए।

वहाँ हमारी पहले से कोई जान पहचान नहीं थी। जब हमें दूर से ही एक घर दिखा, हम उसी घर में चले गए। वहां एक युवा दंपति से हमारा मिलना हुआ। उन्होंने हमारी ऐसी आवभगत की, कि हम आवाक रहकर अपनी सारी थकान भूल गए। पानी पिया, मूमफलियाँ खाईं। झाबुआ से अलीराजपुर कुछ अलग भी है उस तरफ भिलाला परिवार अधिक हैं, वहाँ भील कम हैं, भिलालों का रहन सहन भीलों से कुछ अलग है, भिलालों के घर, परिवार अधिक आकर्षक, स्वच्छ और सलीके दार हैं। उस दंपति ने हमसे कहा कि खाम्बा ज्यादा दूर नहीं है, पास ही है पर आपको वहाँ पहुँचने में डेढ़ से दो घंटे लगेंगे। यह एरिया मथवाड़ की ऊँची ऊँची पहाड़ियों का एरिया है यहाँ पर दूरियों को किलोमीटरों की जगह समय में बताते हैं जैसे एक क्लॉक (घंटे) या दो क्लॉक। एक किलोमीटर या दो किलोमीटर कहकर कोई दूरी नहीं बताता।

साम के चार बजे गए थे और अभी हम बोरवाला में ही बातें कर रहे थे। खाम्बा पहुँचते पहुँचते 6 बजते। उन्होंने हमें रुकने केलिए भी कहा पर हम खाम्बा की तरफ बढ़ गए। बोरवाला में हमें मिले व्यवहार ने हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया। खाम्बा जाने के लिए हमें फिर एक बार ऊपर की ओर चढ़ना था और फिर एक बार नीचे उतरना था। खाम्बा जाते जाते हम एक बार फिर से रास्ता भटक गए, वहाँ दूर दूर तक कोई घर नहीं थे। चलते चलते हम 7 बजे एक घर में पहुँच गये। वह घर भी भिलाला सोलंकी परिवार था। आपको यह बात बताता चलूँ कि इन पहाड़ों की ऊँचाई कुछ इस तरह समझ लो कि एक बार बरसात के समय हम जब रानी काजल माता की पहाड़ी पर थे तब बादल नीचे और हम ऊपर थे। ऐसा कई बार होता जब बादल इन पहाड़ियों की मेखला पर ही बरसते हैं। नर्मदा के उत्तर तट की घाटी में यह पहाड़ियाँ विंध्याचल पर्वत की श्रेणियाँ हैं, काफी ऊँची हैं। इसके लगभग 20 किलोमीटर पश्चिम में गिरनार पर्वत श्रेणी शुरू हो जाती हैं।

खाम्बा में रात हो गयी थी, शर्दियों के दिन थे, ठंड अधिक थी, अंधेरा भी घिर आया था। पूरा घर चौकन्ना था पूर्व नियोजित व्यवस्था की तरह हमें खाट पर बिठाया, बड़ा ही गजब का स्वागत सत्कार हुआ। बिना पूँछे भोजन करवा दिया, हमने भी पूरे इत्मीनान के साथ बाजरे की रोटी स्वाद ले लेकर खाई पर हमें कुछ अचरज भी हो रहा था कि इतना सब कैसे हो रहा है? रात करीब 9 बजे हम जब पूरे परिवार के साथ बैठकर किस्सा कहानी के दौर में पहुँच गए तो हमने कुछ सकुचाते हुए अपने अचरज की बात पूछी, हम गैर परिचितों का आपने जान पहचान के बिना रिश्तेदार जैसा आतिथ्य सत्कार किया, हम कुछ समझे नहीं।

तब घर के मुखिया ने बताया कि हमने आप लोगों को दूर से ही देख लिया था, हम समझ गए थे कि ये कोई नर्मदा मैया की परिक्रमा के यात्री हैं, रास्ता भटक गए हैं इसलिए हमने आपकी रहने, ठहरने, भोजन की व्यवस्था आदि सब पहले ही करली है। यहाँ कभी कभी कुछ नर्मदा परिक्रमा के लोग भटकर आ जाते हैं। हमारी शंका का समाधान उन्होंने कर दिया पर हमारे मन में एक नया प्रश्न उभर आया कि क्या नर्मदा परिक्रमा यात्रियों से इनकी कुछ कमाई हो जाती होगी, भोजन पानी कराके यात्रियों से कुछ शुल्क ले लेते हैं होंगे, आदि, बैसा कोई शुल्क होगा तो हम वह शुल्क देने के लिए तैयार थे पर यह हमारी निकृष्ट सोच से उतपन्न हुई बेमतलब की समस्या निकली। उन्होंने यह कह कर हमारी शंका को निर्मूल कर दिया कि भगवान ने यहाँ हमें आप जैसों सज्जनों की सेवा के लये पहले से ही भेज दिया है।

हमने इनके इन जीवन मूल्यों को नमन किया और क्षणिक रूप से यह भी सोचा कि क्या इनके ऐसे कुछ गुण हममें भी आ सकते हैं क्या? खैर हमारी यात्रा सात दिन तक उस मथवाड़ क्षेत्र में चलती रही। उस समय हम खाम्बा, भिताड़ा, सुगट, भानचिड़ी, झंडाना, छोटी फड़तला, बड़ी फड़तला आदि स्थानों पर गए। धरती का वह स्वर्ग दर्शनीय है। भौतिक विकास की वहाँ जरूरत है, क्योंकि वहाँ आवागमन अभी भी दुरूह है। 40 किलोमीटर लम्बा 20 किलोमीटर चौड़ा नर्मदाघाटी का वह क्षेत्र आधुनिक, आवश्यक सुख सुविधाओं से बंचित है, नवीन युग के विज्ञान संमत ज्ञान की बात
ट जोह रहा है। यद्यपि गए दो साल पहले ही गुलवट से खाम्बा तक सड़क बन रही है, खाम्बा से झंडाना तक आगे वह दो भागों मे आगे जाएगी। अब खाम्बा तक जीप भी जाने लगी है। वहाँ का जनजीवन बहुत कुछ प्रेरणादायक है, संस्कारप्रद है। वहाँ का हर दिन नवीनतम था, अविस्मरणीय।

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

बाहर से कैसे दिखते हैं' अलीराजपुर झाबुआ के गाँव

सोरवा आलीराजपुर जिला का एक विख्यात इलाका है। दारजा, बेजलिया, भावरसेड़ी, कुम्भी, कालीवेल इन गांवों अब सड़क बन गई है। हाट बाजार में में जाना सरल हो गया। पहले उनके अपने विकासखंड कट्ठीवाड़ा में जाने का रास्ता 80 किलोमीटर दूर था पर अब उसकी दूरी आधी रह गयी है। फूलमाल से सोरवा का मार्ग बनजाने से यह मार्ग सरल हो गया। आज भी वहां घना जंगल है।

एक बार हम कुछ शिवगंगा के कार्यकर्ता भावरसेड़ी और बेजलिया, दारजा आदि गाँवों में घूम रहे थे, वहां पूछने पर पता चला कि वहां के 40 से अधिक आयु के नागरिक पुरुष महिलाओं ने झबुआ नहीं देखा था। जिन्होंने रेल नहीं देखी ऐसी स्थिति अकेले बेजलिया के 10-12 परिवारों में थी। कुम्भी में फूलमाल के एक व्यापारी ने कपास के खेत को उसी समय खरीद लिया था जब कपास खेत में पक रहा था। उस किसान ने यही कहा कि हर साल ऐसा ही हिअ है।

साप्ताहिक हाट फूलमाल में लगती है। हाट के दिन दुकानदार किसानों को एक क्विंटल पर 100 रुपये काम देते हैं। हाट के अलावा अन्य दिनों में में उसी उपज को 100 रुपये अधिक कीमत पर लेते हैं। चूंकि किसान हाट के अलावा दिनों में आवागमन की सुविधा के अभाव में आ नहीं सकता, हाट के दिन आना ही उसके लिये सरल है, व्यापारी किसान की इस मजबूरी का भरपूर लाभ उठाते हैं।

अब तो गाँवों में बच्चों का स्कूल जाने का प्रतिशत बढ़ गया है। पढ़ाई का स्तर सामान्य से भी कम है पर स्कूल जाने का असर बच्चों के साथ माता पिता का भी विश्वास बढा रहा है। झाबुआ अलीराजपुर के ग्रामीण अंचलों में 80 -90 क्सल पहले जैसी स्थिति देखने को मि जाती है। वहाँ गाँव का मतलब छोटे छोटे फलिये हैं। बिजली का नितांत अभाव है। सरकार द्वारा सौरऊर्जा के प्रबंध वहां देखने को मिल जाते हैं।

गाँवों में मक्का पीसने की मोटे मोटे पटोवाली घट्टी आज भी कार्यरत मिल जाती है। रासायनिक खेती वहाँ अभी भी कम है। तुअर खेती बहुतायत में वहीं होती है। सबसे अधिक स्वादिष्ट तुअर की दाल कट्ठीवाड़ा, सोंडवा में मिलती है। भावरसेड़ी ओर बेजलिया के दोनों गांवों में पशु बाँधने के बाड़े में गोबर साल में एक ही बार उठाते हैं। गाय, भैंस, बकरी जहाँ बाँधे जाते हैं , प्रतिदिन जनबरों का गोबर मूत्र वहीं इकट्ठा होता रहता है। पशुपालन की अजीब बात वहीं देखने को मिली। बाड़े में एक से डेड़ फुट तक गोबर एक के ऊपर एक तह के रूप में जम जाता है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

कॉमरेड मंगलेश डबराल के नाम एक खुला खत -------------------------------------------------------

कॉमरेड मंगलेश डबराल के नाम एक खुला खत::- अग्निशेखर
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''मुझे अफसोस है कि आपने कल अपने एक पोस्ट में विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की त्रासदी पर जले पर नमक छिड़का है. आपने बहुत पीड़ा पहुँचाई है. यह आपसे अपेक्षित न था.
मेरा संकेत आपके विगत दस वर्षों में कश्मीर में मारे गये कश्मीरी हिन्दुओं की संख्या जानने की ओर नहीं है, यह जानना किसी का भी अधिकार है. चाहे कारण कोई भी हो.
मेरी घोर आपत्ति आपके उस महाझूठ से है जो आपने उक्त पोस्ट से छिडे वाद-विवाद के दौरान बड़ी शान और इत्मीनान से इन शब्दों में लिखा है -
"जी हाँ, मैं कश्मीर गया था. जब दो हिन्दुओं की हत्या के बाद तब के राज्यपाल और भाजपा के चहेते जगमोहन ने फौज के ट्रकों से हिन्दू परिवारों को जम्मू छोड़ा था. असली खलनायक जगमोहन थे. मैंने इस पर एक लंबी रपट लिखी थी."
इससे बड़ा सफेद झूठ क्या हो सकता है!
अगर आप यह नहीं लिखते कि आप कश्मीर गये थे और आपने इसपर लंबी रपट भी लिखी थी, यकीन मानिए मैं आपके कहे को उसी तरह इग्नोर करता जिस तरह 1990 में दिल्ली के मानवाधिकारवादियों की कश्मीरी पंडितों की जलावतनी और उसके असली कारणों पर एकतरफा, मनगढंत रिपोर्ट को पीड़ित विस्थापितों ने किया था. यह लाखों कश्मीरी विस्थापितों के जीनोसाइड और उनके एग्जोडस का अकल्पनीय अपमान था. और जैसे हिटलर के गोयबल्ज़ की आत्मा उनमें उतरी थी.
इसी तरह आप जैसा कवि और वरिष्ठ साहित्यकार आज 27 वर्ष के बाद इतना भयंकर झूठ बोलेगा, यह अफसोसनाक है. आप असहमति के हकदार हैं, लेकिन एक भयावह त्रासदी के कारणों को आप इतनी संवेदनहीनता के साथ झुठलाएंगे, और अपने भाट और चाटुकारों की वाहवाही से फूले नहीं समाएंगे, ऐसा तो न सोचा था. आपके कवि और आपके व्यक्ति के बीच इतनी चौड़ी खाई का होना दुखद है.
वैसे भी आपने मुझ जैसे कई अपने अच्छे पाठकों और प्रशंसकों को तब पहला बड़ा झटका दिया था, जब सुब्रतो रॉय की 'राष्ट्रीय सहारा' में डॉ नामवर सिंह के कदम से कदम मिलाकर आप अपना वामपंथ ताकपर रखकर नौकरी करने गये थे. और सुबह शाम "सहारा प्रणाम" ठोककर दिहाडी पक्की करते. याद होगा मैंने आपको इस पर एक छोटा सा पत्र भी लिखा था.
यह तो नहीं झुठलाएंगे आप कि मैं विगत 27 बरस से जलावतनी में हूँ. भले ही मेरे क्या, लाखों कश्मीरी विस्थापितों के त्रासद अनुभव झुठलाइए और यह कहते फिरिए कि कवि अग्निशेखर सहित कश्मीर मूल के सैकड़ों कलाकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, शायरों, चित्रकारों और संगीतकारों को भी राज्यपाल जगमोहन ने फौज की गाड़ियों में जम्मू छोड़ा. कितना बड़ा मज़ाक है!
आप यह भी नहीं झुठलाएंगे न कि विस्थापित कवि अग्निशेखर आपके पास जनसत्ता कार्यालय में अक्सर आता था और आपसे अपने अनुभव साझा करता था. कई कई बार आपने अग्निशेखर की कविताएँ भी प्रकाशित कीं. और पीछे जाएँ तो आप मेरे कश्मीर मेरे घर भी आए थे प्रयाग शुक्ल, इब्बार रब्बी के साथ. तब जो कश्मीर आपने ऊपर ऊपर से देखा था, जिस तरह मेरे मुहल्ले के पड़ोसी मुसलमान दुकानदार ने मेरे घर का रास्ता बताया था और बुबा सब्जीवाला तो साथ भी आया था. बुबा सब्जीवाला अक्सर मेरे पिता के पास आता था दुकानदारी की लिखत-पढत के लिए जो वत्सल भाव से पिता उसे बेटे की तरह जानकर कर देते थे.
तब वो अलग कश्मीर था. हालाँकि अंदर-अंदर आंच थी जो आप दो तीन दिवस के लिए कश्मीर आए सैलानी-दृष्टि से अनुभव नहीं कर सकते थे. फिर भी वो परिदृश्य इतनी द्रुत गति से और इतने नाटकीय ढंग से बदलकर घृणा तथा हिंसा से भर जाएगा, हवा इतनी हिंदु विरोधी और भारत विरोधी पाकिस्तान परस्त सशस्त्र क्रांति का सा रूप लेगी, यह सोच से परे था.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब हालात इतने खराब हो जाएँ कि आप अपवाद छोड़कर अपने बरसों के दोस्तों और पड़ोसियों से भयभीत रहने लगें भीतर-भीतर. वर्ष 1990 ऐसा ही दुर्भाग्य लेकर आया था तब.
आप इस बात को भी शायद आज नहीं झुठलाएंगे कि मैंनै आपको कितनी बार 'जनसत्ता' के उसी कार्यालय में कितने लोमहर्षक किस्से सुनाये और सुनवाये थे कि आपके चेहरे पर घबराहट तैरती. याद करिए एक दिन मेरे साथ आई एक महिला मित्र ने जब आपके चैंबर में पहले से बैठे मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार से अपनी हिस्से की दास्तान सुनाने के प्रसंग में बांडीपुर कश्मीर की अध्यापिका गिरिजा रैना के कुपवारा में अपहरण, सामूहिक बलात्कार के बाद उसे आरा चौपाल पर जीवित दो फाड़ चीरने की रोंगटे खड़े कर देनी वाली घटना सुनाई थी और आपने मेरे कान में सहमे स्वर में पूछा था, "अग्निशेखर, क्या यह सच है?"
मेरी हामी के बाद आप गहरी खामोशी में चले गये थे, जो कि एक संवेदनशील व्यक्ति से अपेक्षित था.
मैंने यह एकाध प्रसंग आपको इसलिए याद दिलाया क्योंकि आपने लिखा -
"दो हिन्दुओं की हत्या के बाद तबके राज्यपाल जगमोहन ने फौजी गाड़ियों में कश्मीरी हिन्दुओं को जम्मू छोड़ा."
ऐसा कहते आपकी आत्मा को भी कोई खेद नहीं हुआ? मुझे ताज्जुब है.
आप पत्रकार के नाते एक कश्मीरी आतंकवादी दरिंदे बिटा कराटे की बीस कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याओं के टीवी पर खेदविहीन भाव से किए कबूलनामे के बारे में तो जानते ही होंगे. यू ट्यूब पर उसका वीडियो बयान देखें. कहता है कि मैंने पाकिस्तान के आकाओं के कहने पर अपने घनिष्ठ मित्र सतीश तिक्कू सहित 20 कश्मीरी पंडितों को मारा. उसके बाद गिनती भूल गया.
और आप कह रहे हैं कि दो हिन्दुओं की हत्या के बाद प्रायोजित विस्थापन हुआ.
मंगलेश जी, सरला भट्ट, सुमित्रा, आशा, पिट्टी, प्राणा गंजू, सोनी सुंबली सहित दर्जनों कश्मीरी हिन्दु स्त्रियाँ बलात्कार के बाद मार डाली गयीं. कवियों, कलाकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, वकीलों सहित सैकड़ों कश्मीरी पंडित बुद्धिजीवियों और आम जनों की बर्बर हत्याओं, खुली धमकियों, अपहरणों और घरों पर हमलों से हमारे लिए विस्थापन ही एकमात्र विकल्प बना.
विद्या रतन आसी का एक शेर है -
जैसे माहौल में जिए हम लोग।
आप होते तो खुदकुशी करते।।
आपको मैंने जनसत्ता कार्यालय में भी एकबार अपने भागने की त्रासद कहानी संक्षेप में सुनाई थी कि किस तरह मेरे मुहल्ले का ही एक दुकानदार अपने तीन-चार हथियार बंद आतंकवादियों के साथ एक शाम मुझे मारने आया था. घरों की बिजलियां बंद करवाई जाती थीं हर शाम. ब्लैक आऊट करवाया जाता. कि किस तरह मुझे जो धमकी पत्र आंगन में पड़ा मिला था, जिसमें मेरी खता थी कि मैं हिंदी में लिखता हूँ, हिंदी हिंदुस्तान की जुबान थी और भी बहुत कुछ बकवास थी.
यह कितना त्रासद है कि हमारा सच झूठ लगने की हद तक लगने वाला ऐसा सच है. लेकिन जब आप इस अवर्णनीय सच को प्रामाणिक पाएँगे तो विस्मित होकर संभवतः प्रायाश्चित से भर जाएँगे. तब तक लेकिन बहुत देर हो चुकी होगी.
कश्मीरी कहावत है -'पोज़ पजि आलम् दजि' अर्थात् जब तक प्रमाणित होगा सच तब तक भस्मीभूत होगा जग.
आदरणीय महोदय, विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के पास जो आँकड़े हैं उनके अनुसार लगभग 1200 से अधिक कश्मीरी पंडित कश्मीर में चुन-चुनकर मार डाले गये. शायद आप कहेंगे कि संख्या फिर भी नगण्य है.
राज्य सरकार ने भी इस संख्या को ढाई सौ से तीन सौ तक कम करके बताया है. 1990 के आरंभिक वर्षों में जम्मू, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, जयपुर और मध्य प्रदेश आदि जगहों पर सैकड़ों शरणार्थी कैंपों में ऐसे कितने ही परिवार थे, जिनका कोई न कोई सदस्य कश्मीर से ही गायब था. उन दिनों दरिया से कितनी ही विकृत लाशें मिलने की खबरें आतीं.
यहाँ मैं ज्याँ पाल सार्त्रे के एक प्रसंगानुकूल एक कथन को (कुमार विक्रम के सौजन्य से) उद्धृत करना चाहूँगा कि फासीवाद इससे नहीं समझा जाता कि उसके हाथों कितने लोग मार डाले गये बल्कि उसने पीड़ितों को किस तरह मारा.
"Fascism is not defined by the number of its victims, but by the way it kills them"-Jean-Paul-Satre,22/6/1953
रही बात विगत दस साल में कितने कश्मीरी हिन्दुओं की कश्मीर में हत्याएँ हुईं. निश्चित रूप से कम हुईं. क्योंकि कुछ सौ परिवार अपवादस्वरूप छोड़कर लगभग साढ़े चार लाख कश्मीरी हिन्दू परिवारों का कश्मीर से वर्ष 1990-91-92 में ही समूल सफाया हो चुका था. आपको पता होना चाहिए कि कश्मीर में आज की तारीख में कितने पंडित रहते हैं. कश्मीर स्थित हिंदू संघर्ष समिति, जिसके पहले प्रधान कम्युनिस्ट विचारधारा के मजदूर नेता हृदय नाथ वाँचू थे और उनकी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या की थी, के अनुसार पूरी घाटी में 800 के करीब परिवार रहते हैं. एक परिवार के सामान्यतः चार सदस्य भी मानकर चलें तो 3200 के आसपास संख्या बनती है. इसके अतिरिक्त कश्मीर घाटी में प्रति वर्ष दरबार-मूव के चलते डोगरा हिंदुओं, सिखों और जम्मू के मुस्लिम सरकारी नौकरीपेशाओं की संख्या मई से अक्तूबर तक बढ जाती है. यहाँ कश्मीर ग्रीष्मकालीन और जम्मू शीतकालीन राजधानी है.
आपने सरलीकरण करते कश्मीरी हिन्दुओं के हत्यारों को लश्कर-ए-तोयबा जैसे अंतरराष्ट्रीय रिकाग्नाइज्ड टैररिस्ट ग्रुप्स के आतंकी बताया है. क्या आप जानते हैं कि 1990-91 में अधिकांश कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याएँ किसने कीं? जेकेएल एफ के हत्यारों ने जो पाकिस्तान समर्थित तो थे ही थे, लेकिन थे स्थानीय हमारे अडोसी पड़ोसी, गाँव मुहल्ले, गली कूचों और दोस्तों के दोस्त या आपके जानकार.
यह जो शुरू से लाखों लोग उनके समर्थन में जुलूसों जलसों या हर जुम्मे की निमाज़ के बाद हिंसक प्रदर्शन करते हैं, यह क्या लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद आदि से आई जनता होती है? आपको पता है कि विदेशी आतंकवादियों को कश्मीर में 'मेहमान मुजाहिदीन' कहते हैं.
मैं भाजपा या किसी जगमोहन का कोई भक्त न हूँ न रहा हूँ. लेकिन जगमोहन को कश्मीरी हिन्दुओं की उनकी मातृभूमि कश्मीर से बेदखली के लिए बलि का बकरा बनाना सरासर गलत और एक सुविचारित disinformation campaign का हिस्सा है. जो दिल्ली से पाकिस्तान, वाशिंगटन और लंदन तक खूब चलाई गयी. हमारे महान छद्म बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादी झूठ प्रचारित करने और सच को तोड़ मरोडकर कर दुनिया के सामने रखने के गुनाहगार हैं, जिनमें अब आप भी शामिल हो गये.
मैं यहाँ कितने हत्याकांड गिनाऊं जिनमें चुनचुनकर हिन्दुओं, सिखों को मारा गया. वन्दहामा, संग्रामपोरा, छानपोरा, छटीसिंहपोरा, गूल आदि.
आपने यह सवाल उछाला है कि क्यों कश्मीरी पंडितों ने भाजपा को अपना सरपरस्त माना जिसका आपको जवाब नहीं मिलता, बस एक अंध राष्ट्रवाद का कर्कश राग छेड़ दिया जाता है. मंगलेश जी, क्या आप सच में इस बात से अनभिज्ञ हैं या कि बन रहे हैं? अगर सच में नहीं जानते हैं तो आपकी हैरानी जायज़ है. आप जानते हैं कि पारंपरिक तौर से नेहरूवियन कहिए या गांधीवादी सोच के कश्मीरी पंडितों की इस मायने में प्रतिष्ठा रही है कि ये लोग अत्यंत प्रगतिशील, अध्ययन और अध्यापन से जुड़े लोग रहे हैं. महान भारतीय काव्यशास्त्रियों और सौंदर्यशास्त्रियों, शैवशास्त्रियों के वर्तमान उत्तराधिकारियों को यह अचानक क्या हो गया कि 1990 में धर्म के नाम पर कश्मीर घाटी से खदेड दिए जाने के बाद यह लोग आपके अनुसार भाजपा की सरपरस्ती में जीने लगे.
जो अमूमन कश्मीर में कभी संघ या भाजपा के प्रति आकर्षित न हुए, जिन्होंने कभी एक नगर निगम के पार्षद तक को नहीं चुना या श्रीनगर के हब्बाकदल विधान सभा क्षेत्र में भाजपा नेता टिकालाल टपिलू को कश्मीरी पंडितों ने 2200 से ज्यादा वोट नहीं दिया. जहाँ से वे अगर चाहते तो जिता सकते थे और उसी वकील टिकालाल टपिलू को पंडितों के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में जब आतंकवादियों ने गोलियों से भून डाला तो बीस हजार से ज्यादा कश्मीरी पंडित उसकी शवयात्रा में शामिल हुए. जिसमें श्रीनगर के भाजपाई, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, काँग्रेसी और नेशनल कान्फ्रैन्सी सभी राजनीतिक दलों के कश्मीरी पंडित सम्मिलित हुए.
उसके बाद एक के बाद एक कश्मीरी पंडितों को चुन चुनकर निर्बाध मारते चले जाने का खूनी खेल आरंभ हुआ जो तब तक नहीं रुका जब तक कि सभी कश्मीरी पंडितों को अपनी मातृभूमि से बे दखल न किया गया. धमकियाँ, अपहरण, बलात्कार का क्रम भी साथ साथ जारी रहा. तब का मुख्यमंत्री डॉ फारूख अब्दुल्ला फ्रांस के नीरो की तरह धधकते कश्मीर को अनाथ छोड़कर लंदन जाकर गोल्फ खेलता रहा.
आतंकवादियों ने कश्मीर के अखबार-ए-अलसफा, चट्टान में हिंदुओं को खली धमकियाँ देना शुरू किया। हमारी जलावतनी का बेसुरा राग- जगमोहन अलापने वालों को अखबार-ए-अलसफा के पहले पृष्ठ पर हेडलाइन के रूप में छपी यह धमकी पढनी चाहिए-
"कश्मीरी पंडितों 48 घंटों के अंदर अंदर कश्मीर घाटी छोड़ कर जाओ। वर्ना ...."
आपको उस समय का परिदृश्य याद दिलाने के लिए आए दिन शहरों, कस्बों, जिलों में सैकड़ों की तादाद में निकलने वाले भारी जुलूस निकले, जिनमें ये गगनचुंबी नारे गुँजाए जाते -
"ऐ काफिरो, ऐ जालिमो! कश्मीर हमारा छोड़ दो!"
"अगर कश्मीर में रहना होगा, अल्लाह हो अकबर कहना होगा!"
"हम क्या चाहते आजादी
आजादी का मतलब क्या
ला इल्लाह इल्लाह!
पाकिस्तान से रिश्ता क्या
ला इल्लाह इल्लाह!"
"भारत वालों जान लो
कश्मीर तुम्हारी मौत है!"
"कश्मीर बनेगा पाकिस्तान! "
"भटन हुंद ब्योल
खोदायन गोल! (खुदा कश्मीरी हिन्दुओं का बीज नासे)
"असि छु बनावुन पाकिस्तान
भटव रोसतुय भटन्यव सान्निध्य!"
(हम बनाएँगे पाकिस्तान
पंडितों बिना पंडितानियों सहित)
ऐसे माहौल में बसों, टैक्सियों, ट्रकों, ट्रालियों में, जिसे जो साधन मिला, अपने बाल बच्चे विशेषकर बहू बेटियाँ लेकर कश्मीरी पंडित ठठ के ठठ भाग आए जम्मू। अफसोस कि आप कह रहे हैं कि तबके राज्यपाल जगमोहन ने फौजी गाड़ियों मे जम्मू छोड़ा। कोई इतना झूठ कैसे कह सकता है!
कश्मीरी कहावत है कि जो नदी पार से गाली दे या मुँह पर झूठ कहे, दोनों को 'केशव कहा न जाई का कहिए' .....
जम्मू के लोगों ने अपने घरों के, मंदिरों के, गुरुद्वारों के, स्कूलों के, धर्मशालाओं के, तबेलों के, ढरबों के खिड़की दरवाजे खोले और दुखियारों को सर छिपाने की जगह मिल गयी. निकृष्ट कोटि का दुष्प्रचार यह किया गया कि राज्यपाल जगमोहन ने पंडितों को जम्मू दिल्ली आदि शहरों में महंगे फ्लैट और प्लॉट देने का प्रलोभन देकर कश्मीर से निकलने को प्रेरित किया, ताकि वह घाटी में मुसलमानों का सफाया कर सके और कश्मीरी पंडितों को कोई आँच न आए.
झूठ-झूठ ... कितने-कितने बेसिर पैर झूठ!
अब शरणार्थी कैंपों में अस्तित्व और अस्मिता का दैनंदिन संघर्ष करने को अभिशप्त गैर- संघी तथा गैर भाजपाई कश्मीरी पंडितों ने अपेक्षा की थी कि उनके कम्युनिस्ट दोस्त और नेता, समाजवादी या लोहियावादी, काँग्रेसी दलों के लोग और नेता उनकी खबर लेंगे. राहत के दो शब्द बोलेंगे. उनके आँसू पोंछेगे. कुछ मदद करेंगे. लेकिन कोई नहीं आया सामने.
तेजाबी धूप में मोटे रैग्जीन के 8×10 फीट के तंबुओं में पड़े शरणार्थी कश्मीरी पंडितों के लिए यह सबसे बड़ा त्रासद अनुभव था. कोई उनके बारे मुँह तक नहीं खोल रहा था. उन्हें एकदम महसूस हुआ कि वे अकेले हैं. कश्मीर का बड़े से बड़ा कम्युनिस्ट सड़कों पर था. वाम विचारक प्रोफेसर एच एल मिस्री, कम्युनिस्ट ओएन त्रिछ़ल, लोहियावादी राजनीतिशास्त्री डॉ एमके टेंग, चित्रकार लोक कौल, मध्य एशिया के अप्रतिम फारसी विद्वान डॉ काशीनाथ पंडिता, चित्रकार बंसी पारिमू, कहानीकार हरिकृष्ण कौल से लेकर डॉ रमेश तैमीरी और महाराज शाह आदि वामपंथी बुद्धिजीवी और रचनाकार बेबस होकर राहत प्रदान कर रही भाजपा नेताओं और कार्यालयों में चक्कर काटने को अभिशप्त थे.
भाजपाई सामने आए, चाहे उनके राजनीतिक निहितार्थ, वो सब राजनीतिक दलों के होते हैं. लेकिन आई सामने भाजपा. शरणार्थी कैंपों में तरस रहे, मर रहे कश्मीरी पंडितों को राहत दी, और दिलाई. वामपंथी चुप रहे. गायब रहे समाजवादी. कांग्रेसी. प्रगतिशील लेखक और पत्रकार. सेक्युलर कहलाने वाले उदारवादी. किसी ने मुँह न खोला.
एक कविता, एक कहानी, एक टिप्पणी, एक संयुक्त हस्ताक्षरित अपील, एक संपादकीय तक नहीं. पत्रिकाओं के विशेषांक तो दूर, उल्टे में ये तथाकथित सेक्युलर महान लोग हमारे विस्थापन के बारे में झूठ फैलाने में लग गये. विस्थापितों में भयंकर प्रतिक्रिया हुई, जो सहज थी. सामने भाजपा थी. राहत और बड़बोलेपन के साथ. समर्थन और सहानुभूति के साथ.
यही जवाब मैंने राजेंद्र यादव के ऐसे ही एक सवाल के जवाब में दिया था. उन्होंने हंस कार्यालय में पूछा था, यह सेक्युलर कश्मीरी भाजपा की झोली में कैसे गये? मैंने राजेंद्र यादव से कहा था कि इसके जिम्मेदार आप हैं, आप जैसे लोग हैं. वामपंथियों ने ऐसी कोई पहल की होती तो वे कभी न झुकते उनकी तरफ. राजेन्द्र यादव मेरी दलील सुनकर हामी में सर हिलाते रहे.
फिर ढाई साल के बाद घटी बाबरी मस्जिद ढहाने की घटना. फिर दंगे. फिर गोधरा की रिएक्शन में गुजरात दंगे. हत्याएँ. मारकाट. सारे वामपंथी, प्रगतिशील, सेक्युलर बुद्धिजीवी जाग गये. खूँखार हुई. कवियों ने कविताएँ रचीं. कहानियाँ लिखी गयीं. जुलूस निकले. जलसे हुए. पत्रिकाओं के विशेषांकों पर विशेषांक निकले. संयुक्त हस्ताक्षरित अपीलों पर अपीलें जारी हुईं. जिन कश्मीरी विस्थापितों की मुस्लिम आतंकवादियों और अलगवादियों के हाथों सामूहिक तबाही पर आप लोग आपराधिक खामोशी धारण किए रहे, उन कश्मीरी जलावतन साहित्यकारों ने भी अयोध्या और गुजरात के हिंसाचार का खुलकर विरोध किया. कविताएँ लिखीं. सहमत के प्रदर्शनों में शामिल रहे.
डॉ अपूर्वानंद के बुलाये सफदर हाशमी मार्ग पर विरोध प्रदर्शन में मैं अपने कई साहित्यकार और रंगकर्मी तथा कलाकार साथियों के साथ शामिल हुआ और तबके गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जारी निंदा प्रस्ताव पर मेरे भी हस्ताक्षर देखें.
लेकिन हमारे साथ कोई न रहा. आप न रहे. किसी ने एक कविता तक न लिखी. वैसे भी हत्याओं के दिनों में कविताएँ रच रचकर होता भी क्या है! समय के तेवर और संवेदनाएँ सच्चे इतिहास की तरह दर्ज रहती हैं.
जैसे आज जो चुनिंदा हत्याएँ हो रही हैं कलबुर्गी से पंसारी तक जिसकी मैंने जम्मू में प्रेस कान्फ्रैन्स बुलाकर घोर निन्दा की. वैसे ही जैसे मुम्बई में भी जावेद अख्तर को मोती कौल और अशोक पंडित को साथ बिठाकर प्रैस कान्फ्रैन्स की थी गुजरात दंगों और जीनोसाइडल हिंसा के खिलाफ. आपको शायद यह भी याद दिलाता चलूँ कि मैं कश्मीरी विस्थापित कैंपों से गुजरात के शाह आलम खान जैसे कैंपों में राहत लेकर भी गया था. क्या आप ऐसी कोई एक भी मिसाल दे सकते हैं, अपनी तरफ से?
एक भी कोई कविता 'गुजरात के एक मृतक का बयान' जैसी जो आपने किसी कश्मीरी पंडित मृतक या उनके विनाश पर लिखी हो? कभी आप जम्मू के किसी शरणार्थी कैंप में आए हों?आपको मैंने कश्मीरी विस्थापितों के पहले विश्व सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण पत्र भेजा जो अकेले आपको नहीं, दर्जनों साहित्यकारों को भी दिया था. कोई नहीं आया. सिवाय निर्मल वर्मा और डॉ संजय चतुर्वेदी के. विश्वनाथ त्रिपाठी जी हमारी ओर से वाहन न भेज सकने के कारण दिलशाद गार्डन से खेलगाँव न आ सके.
इस तरह अकेले पड़े कश्मीरी विस्थापित और उनके लेखक और कवि. लेकिन हम लिखते रहे. हमने मृतकों का धर्म देखकर शोकगीत नहीं लिखे. अभी जुनैद(वल्लभगढ), अखलाख(दादरी), पहलू खान(अलवर), मोहम्मद मज़लूम और इनायतुल्ला (झारखंड) और पोहरू कुपवाड़ा कश्मीर में कश्मीरी पंडित सिपाही समीर भट्ट तथा फिर डीएसपी मुहम्मद अयूब पंडित(जामिया मस्जिद, श्रीनगर) की बेकाबू हिंस्र भीड़ द्वारा बर्बर हत्याओं के विरोध में मेरी निम्नलिखित कविता 'जघन्य है ऐसा समय' तो पढ़ी ही होगी.
Abha Khanna Dinesh Manhotra Pawan Sharma