सोरवा आलीराजपुर जिला का एक विख्यात इलाका है। दारजा, बेजलिया, भावरसेड़ी, कुम्भी, कालीवेल इन गांवों अब सड़क बन गई है। हाट बाजार में में जाना सरल हो गया। पहले उनके अपने विकासखंड कट्ठीवाड़ा में जाने का रास्ता 80 किलोमीटर दूर था पर अब उसकी दूरी आधी रह गयी है। फूलमाल से सोरवा का मार्ग बनजाने से यह मार्ग सरल हो गया। आज भी वहां घना जंगल है।
एक बार हम कुछ शिवगंगा के कार्यकर्ता भावरसेड़ी और बेजलिया, दारजा आदि गाँवों में घूम रहे थे, वहां पूछने पर पता चला कि वहां के 40 से अधिक आयु के नागरिक पुरुष महिलाओं ने झबुआ नहीं देखा था। जिन्होंने रेल नहीं देखी ऐसी स्थिति अकेले बेजलिया के 10-12 परिवारों में थी। कुम्भी में फूलमाल के एक व्यापारी ने कपास के खेत को उसी समय खरीद लिया था जब कपास खेत में पक रहा था। उस किसान ने यही कहा कि हर साल ऐसा ही हिअ है।
साप्ताहिक हाट फूलमाल में लगती है। हाट के दिन दुकानदार किसानों को एक क्विंटल पर 100 रुपये काम देते हैं। हाट के अलावा अन्य दिनों में में उसी उपज को 100 रुपये अधिक कीमत पर लेते हैं। चूंकि किसान हाट के अलावा दिनों में आवागमन की सुविधा के अभाव में आ नहीं सकता, हाट के दिन आना ही उसके लिये सरल है, व्यापारी किसान की इस मजबूरी का भरपूर लाभ उठाते हैं।
अब तो गाँवों में बच्चों का स्कूल जाने का प्रतिशत बढ़ गया है। पढ़ाई का स्तर सामान्य से भी कम है पर स्कूल जाने का असर बच्चों के साथ माता पिता का भी विश्वास बढा रहा है। झाबुआ अलीराजपुर के ग्रामीण अंचलों में 80 -90 क्सल पहले जैसी स्थिति देखने को मि जाती है। वहाँ गाँव का मतलब छोटे छोटे फलिये हैं। बिजली का नितांत अभाव है। सरकार द्वारा सौरऊर्जा के प्रबंध वहां देखने को मिल जाते हैं।
गाँवों में मक्का पीसने की मोटे मोटे पटोवाली घट्टी आज भी कार्यरत मिल जाती है। रासायनिक खेती वहाँ अभी भी कम है। तुअर खेती बहुतायत में वहीं होती है। सबसे अधिक स्वादिष्ट तुअर की दाल कट्ठीवाड़ा, सोंडवा में मिलती है। भावरसेड़ी ओर बेजलिया के दोनों गांवों में पशु बाँधने के बाड़े में गोबर साल में एक ही बार उठाते हैं। गाय, भैंस, बकरी जहाँ बाँधे जाते हैं , प्रतिदिन जनबरों का गोबर मूत्र वहीं इकट्ठा होता रहता है। पशुपालन की अजीब बात वहीं देखने को मिली। बाड़े में एक से डेड़ फुट तक गोबर एक के ऊपर एक तह के रूप में जम जाता है।
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