मंगलवार, 11 जुलाई 2017

विशाल मन का समाज::झबुआ के संस्मरण

मैं और मेरे एक मित्र पहली बार साकड़ी की तरफ से खाम्बा, भिताड़ा गए। साकड़ी के कुछ लोगों ने हमें वहाँ न जाने का सुझाव दिया पर हम चल दिये। दुर्गम अनजान रास्ता था। एक घंटा चढ़ाई चढ़ने के बाद हम दो राहे पर रुक गए। दूर दूर तक कोई व्यक्ति वहाँ दिखाई न दिया। छोटी छोटी पगडंडी बनी थीं। वह जगह साकड़ी और खाम्बा की सीमा पर थी। हमने दिशा का अंदाज लगाया और एक पगडंडी पकड़ पर अपने पग बढ़ा दिए। ऊँची चढ़ाई चढ़ने के बाद वह उतार का मार्ग था। बहुत घना जंगल था, दो घंटे पैदल चलने के बाद भी उस रास्ते  पर हमें एक भी व्यक्ति उस रास्ते पर नहीं मिला। बहुत खोजने के बाद भी खाम्बा गाँव हमें नहीं मिल सका पर हम खाम्बा की जगह बोरवाला गाँव में पहुँच गए।

वहाँ हमारी पहले से कोई जान पहचान नहीं थी। जब हमें दूर से ही एक घर दिखा, हम उसी घर में चले गए। वहां एक युवा दंपति से हमारा मिलना हुआ। उन्होंने हमारी ऐसी आवभगत की, कि हम आवाक रहकर अपनी सारी थकान भूल गए। पानी पिया, मूमफलियाँ खाईं। झाबुआ से अलीराजपुर कुछ अलग भी है उस तरफ भिलाला परिवार अधिक हैं, वहाँ भील कम हैं, भिलालों का रहन सहन भीलों से कुछ अलग है, भिलालों के घर, परिवार अधिक आकर्षक, स्वच्छ और सलीके दार हैं। उस दंपति ने हमसे कहा कि खाम्बा ज्यादा दूर नहीं है, पास ही है पर आपको वहाँ पहुँचने में डेढ़ से दो घंटे लगेंगे। यह एरिया मथवाड़ की ऊँची ऊँची पहाड़ियों का एरिया है यहाँ पर दूरियों को किलोमीटरों की जगह समय में बताते हैं जैसे एक क्लॉक (घंटे) या दो क्लॉक। एक किलोमीटर या दो किलोमीटर कहकर कोई दूरी नहीं बताता।

साम के चार बजे गए थे और अभी हम बोरवाला में ही बातें कर रहे थे। खाम्बा पहुँचते पहुँचते 6 बजते। उन्होंने हमें रुकने केलिए भी कहा पर हम खाम्बा की तरफ बढ़ गए। बोरवाला में हमें मिले व्यवहार ने हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया। खाम्बा जाने के लिए हमें फिर एक बार ऊपर की ओर चढ़ना था और फिर एक बार नीचे उतरना था। खाम्बा जाते जाते हम एक बार फिर से रास्ता भटक गए, वहाँ दूर दूर तक कोई घर नहीं थे। चलते चलते हम 7 बजे एक घर में पहुँच गये। वह घर भी भिलाला सोलंकी परिवार था। आपको यह बात बताता चलूँ कि इन पहाड़ों की ऊँचाई कुछ इस तरह समझ लो कि एक बार बरसात के समय हम जब रानी काजल माता की पहाड़ी पर थे तब बादल नीचे और हम ऊपर थे। ऐसा कई बार होता जब बादल इन पहाड़ियों की मेखला पर ही बरसते हैं। नर्मदा के उत्तर तट की घाटी में यह पहाड़ियाँ विंध्याचल पर्वत की श्रेणियाँ हैं, काफी ऊँची हैं। इसके लगभग 20 किलोमीटर पश्चिम में गिरनार पर्वत श्रेणी शुरू हो जाती हैं।

खाम्बा में रात हो गयी थी, शर्दियों के दिन थे, ठंड अधिक थी, अंधेरा भी घिर आया था। पूरा घर चौकन्ना था पूर्व नियोजित व्यवस्था की तरह हमें खाट पर बिठाया, बड़ा ही गजब का स्वागत सत्कार हुआ। बिना पूँछे भोजन करवा दिया, हमने भी पूरे इत्मीनान के साथ बाजरे की रोटी स्वाद ले लेकर खाई पर हमें कुछ अचरज भी हो रहा था कि इतना सब कैसे हो रहा है? रात करीब 9 बजे हम जब पूरे परिवार के साथ बैठकर किस्सा कहानी के दौर में पहुँच गए तो हमने कुछ सकुचाते हुए अपने अचरज की बात पूछी, हम गैर परिचितों का आपने जान पहचान के बिना रिश्तेदार जैसा आतिथ्य सत्कार किया, हम कुछ समझे नहीं।

तब घर के मुखिया ने बताया कि हमने आप लोगों को दूर से ही देख लिया था, हम समझ गए थे कि ये कोई नर्मदा मैया की परिक्रमा के यात्री हैं, रास्ता भटक गए हैं इसलिए हमने आपकी रहने, ठहरने, भोजन की व्यवस्था आदि सब पहले ही करली है। यहाँ कभी कभी कुछ नर्मदा परिक्रमा के लोग भटकर आ जाते हैं। हमारी शंका का समाधान उन्होंने कर दिया पर हमारे मन में एक नया प्रश्न उभर आया कि क्या नर्मदा परिक्रमा यात्रियों से इनकी कुछ कमाई हो जाती होगी, भोजन पानी कराके यात्रियों से कुछ शुल्क ले लेते हैं होंगे, आदि, बैसा कोई शुल्क होगा तो हम वह शुल्क देने के लिए तैयार थे पर यह हमारी निकृष्ट सोच से उतपन्न हुई बेमतलब की समस्या निकली। उन्होंने यह कह कर हमारी शंका को निर्मूल कर दिया कि भगवान ने यहाँ हमें आप जैसों सज्जनों की सेवा के लये पहले से ही भेज दिया है।

हमने इनके इन जीवन मूल्यों को नमन किया और क्षणिक रूप से यह भी सोचा कि क्या इनके ऐसे कुछ गुण हममें भी आ सकते हैं क्या? खैर हमारी यात्रा सात दिन तक उस मथवाड़ क्षेत्र में चलती रही। उस समय हम खाम्बा, भिताड़ा, सुगट, भानचिड़ी, झंडाना, छोटी फड़तला, बड़ी फड़तला आदि स्थानों पर गए। धरती का वह स्वर्ग दर्शनीय है। भौतिक विकास की वहाँ जरूरत है, क्योंकि वहाँ आवागमन अभी भी दुरूह है। 40 किलोमीटर लम्बा 20 किलोमीटर चौड़ा नर्मदाघाटी का वह क्षेत्र आधुनिक, आवश्यक सुख सुविधाओं से बंचित है, नवीन युग के विज्ञान संमत ज्ञान की बात
ट जोह रहा है। यद्यपि गए दो साल पहले ही गुलवट से खाम्बा तक सड़क बन रही है, खाम्बा से झंडाना तक आगे वह दो भागों मे आगे जाएगी। अब खाम्बा तक जीप भी जाने लगी है। वहाँ का जनजीवन बहुत कुछ प्रेरणादायक है, संस्कारप्रद है। वहाँ का हर दिन नवीनतम था, अविस्मरणीय।

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