गुरुवार, 31 अगस्त 2017

भारत के सार्वजनिक जीवन में समाजवाद और सेक्यूलरिज्म को खारिज कर दिया

'भारत के सार्वजनिक जीवन में समाजवाद और सेक्यूलरिज्म को खारिज कर दिया गया है। सेक्यूलरिज्म तो यूरोप की विशिष्ट सामाजिक, राजनैतिक उपज थी। भारत के लिए एक मायने में अर्थहीन थी, साथ ही नुकसानदेह भी।
पाक्षिक पत्रिका यथावत् में श्री शंकर शरण जी के लेख के कुछ अंश' पत्रिका एवं लेखक के प्रति आभार व्यक्त करते हुए प्रस्तुत है:-

1. इसलिए जिन्हें सेकुलरवादियों के कमजोर होने या भाजपा की बढ़त की समीक्षा करनी हो, उन्हें असल बात पर आना चाहिए। हिन्दू धर्म-समाज अपने स्वभाव से ही लौकिक जीवन में सेक्यूलर है। जबकि इस्लाम अपनी बुनियादी टेक से ही सेकुलरिज्म विरोधी है। इसीलिए मुस्लिम देशों या समाजों में सेकुलरिज्म का कोई स्थान नहीं। उनके बीच सेक्युलर के लिए शब्दों है ‘ला-दीनी’, यानी मजहब विरूद्ध। तब यहां सेकुलरिज्म की फिक्र करने वाले या तो नाटक कर रहे या घोर अज्ञान में डूबे हैं।

विडंबना यह कि सेक्यूलर बुद्धिजीवियों के लिए दूसरी बात ही सही है। जिस तरह यहां दशकों से बड़े-बड़े लेखकों, पत्रकारों द्वारा सेकुलरिज्म के नाम पर ऊट-पटांग कारनामे होते रहे, वह अज्ञान ही है। वे यह मोटी बात भी नहीं देखते कि भारतवर्ष में सनातन धर्म के लंबे इतिहास में कभी धर्म के नाम पर रक्तपात नहीं हुआ। किंतु जबसे हमने सेक्यूलरवाद की धारणा उधार ली तब से हमारी समस्याओं का अंत नहीं है।

2. वरेण्यत इतिहासकार सीताराम गोयल ने बिल्कुील ठीक कहा था कि जिन धारणाओं की पृष्ठ‍भूमि और इतिहास नितांत भिन्न हैं, उन की अंधी नकल करके हमने अपनी संस्कृति को घायल और भ्रष्ट ही किया है। यहाँ प्रचलित सेकुलरिज्म  हिन्दू समाज के लिए घातक रहा है। इसे आम जनता ने समझ लिया, इसीलिए मोदी को समर्थन दिया। पर जब तक बुद्धिजीवी भी इसे नहीं समझते, भारत पर स्थाई संकट बना रहेगा। यूरोप के रिलीजन जैसी चीज भारतवर्ष में ईसाई, इस्लामी विचारों के प्रसार से पहले नहीं ढूँढी जा सकती।

3. इसीलिए भारत के लिए सेकुलरिज्म अनावश्यक नारा था, जिसका दुरुपयोग आसान था। यूरोप में चौथी शताब्दी‍ से लगभग हजार साल तक ईसाई चर्च और राज्य के बीच गहरा संबंध था। चर्च और राज्य  मिलकर व्यक्ति के इहलोक और परलोक पर तानाशाही चलाते थे। चर्च के कुपित होने पर व्यक्ति को जिंदा जलाने तक की यंत्रणा दी जाती थी। यूरोपीय राजा मानते थे कि राज्य चर्च की सेवा के लिए है। जब तक यूरोप में ऐसे लोग बचे रहे जिन्हें ईसाइयत में धर्मांतरित कराना शेष था, तब तक चर्च और राज्य का गठजोड़ चलता रहा। ईसाइयत फैलाने के नाम पर राजाओं को चर्च का समर्थन मिला रहा। किंतु पंद्रहवीं शताब्दी तक पूरा यूरोप ईसाई हो चुका था। राजाओं को अपनी सत्ता  के लिए चर्च के सहयोग की विशेष आवश्याकता नहीं रही। उल्टे‍ चर्च के हस्तहक्षेप से अब उन्हें और कठिनाई होने लगी। फिर सोलहवीं शताब्दी  में चर्च की मनमानियों के विरुद्ध यूरोप में विद्रोह होने लगे और ईसाइयत कई गुटों में बंट गई। विभिन्न राजाओं ने एक गुट के साथ जुड़कर दूसरे गुटों को दबाना आरंभ किया। इस तरह रिलीजन के नाम पर विभिन्न देशों में लड़ाइयां शुरू हो गईं। किंतु सौभाग्य से तभी यूरोप के अनेक चिंतक ग्रीस, चीन और भारत जैसी संस्कृतियों की ज्ञान-संपदा के संपर्क में आए। इससे उन्हें मानवीयता और बौद्धिकता के नए सार्वभौमिक विचार मिले। उसी प्रभाव में उन्होंने ईसाई कट्टरता और जड़सूत्री मान्यताओं के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह का सूत्रपात किया। ‘रिफॉर्मेशन’ और ‘रेनेसां’ के आंदोलन उसी की अभिव्यक्तियां थीं। ईसाइयत की अधिकांश मान्याताओं में स्वतंत्र बुद्धि-विवेक से उत्पन्न चुनौती का सामना करने की सामर्थ्य‍ कभी न थी। इसीलिए जल्द् ही उसकी कट्टर मतवादिता को मैदान छोड़ना पड़ा। उन्नीसवीं शताब्दी तक वह स्थिति आ गई जब यूरोप के राज्य चर्च के दबदबे से मुक्त हो गए। अब राज्य  का कार्य यह न रहा कि प्रजा के परलोक का भी जबरदस्ती  ध्यान रखे। यह व्यक्ति के निजी विश्वास में बदल गया। इसे ही राज्य का सेक्यूलर बन जाना कहा गया।

अब समझें कि स्वतंत्र भारत में सेकुलरिज्म का क्या अनर्थ किया गया है। स्वाधीनता आंदोलन के संपूर्ण काल में हमारे किसी चिंतक या नेता ही नहीं, वरन किसी सामाजिक, राजनीतिक संगठन के प्रस्ताव या लक्ष्यी में भी ‘सेकुलरिज्मि’ शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। फिर कैसे एकाएक स्वतंत्र भारत में वही शब्द राष्ट्रीय संविधान के ऊपर भी एक तरह का सुपर-विधान बन बैठा ? यह निश्चित रूप से भीतरघात था, भारतीय जनता पर एक अदृश्य व विदेशी शासन का औजार। सीताराम गोयल ने चेतावनी दी थी कि इस घातक प्रक्रिया और इसके परिणामों का निहितार्थ हिन्दू  समाज अभी तक नहीं समझ पाया है। उनकी चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहि‍ए। वरना हम उस विषैले मकड़जाल से मुक्त नहीं हो सकते जो भारतीय सभ्यता के विनाश का लक्ष्य रखता है।

किंतु स्वतंत्र भारत के दुर्भाग्य से नितांत विपरीत घटित हुआ। उलेमा और मिशनरी वर्ग जिन्होंने सदैव भारतीय संस्कृति के प्रति घोर शत्रुता दिखाई थी, उन्होंंने अब दुष्प्रचार आरंभ किया कि स्वतंत्र भारत में ईसाई और इस्ला मी समुदाय की संस्कृति को बहुसंख्यक हिन्‍दुओं से खतरा है। इसलिए राज्यों को उनकी रक्षा के उपाय, अर्थात विशेष सुविधाएं देनी चाहिए। यह उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे जैसी बात थी। जिस उलेमा और‍ मिशनरी वर्ग ने सदियों से हिन्दू जनता पर राज्यसत्ताओं के प्रयोग से हर तरह के अत्याचार किए, जिसका संपूर्ण रिकॉर्ड उनके अपने ही गौरव-गाथा साहित्य में उपलब्ध है, वही अपने को पीडि़त बता रहा था।

4. यह छल कई कारणों से सफल हुआ। जिसमें नेहरूवादी सत्ता का हिन्दू-विरोधी दुराग्रह मुख्य कारण था। दूसरे यह भी कि हिन्दु‍ओं ने बाहरी विचारधाराओं, मजहबों का अध्ययन-मनन करके जनता को उनके प्रति सचेत करने का कर्तव्य नहीं किया। इसीलिए दुष्टतापूर्ण विचारों को भी आदरणीय समझने की भूल दुहराई जाती रही। इस प्रकार, मजहबी अत्याचारियों से सदियों संघर्ष करके भी हिन्दू समाज उन अत्याचारों के स्रोत के प्रति भोलेपन में पड़ा रहा। उसी भोलेपन में स्वतंत्र भारत के नौसिखिये सत्ताधीश कूटनीति में पगे मुल्ले और मिशनरियों की बात मान बैठे। तबलीगियों और मिशनरियों को अपनी साम्राज्यवा‍दी विचारधारा का प्रचार करने की छूट और विशेष सुविधाएं तक दे दी गई। जबकि हिन्दुओं को वंचित कर, सनातन धर्म-चेतना से शिक्षा व रीति-नीति बनाने से रोक दिया गया। इसी नीति को सेकुलरिज्म का नाम दिया गया।  होना यह चाहिए था कि उन स्वघोषित विस्तारवादी, छल-बल-प्रपंच से धर्मांतरण कराने वाली साम्राज्यवादी विचारधाराओं से हिन्दू समाज को अब सुरक्षा दी जाती जो सदियों बाद मुक्त हुआ था। किंतु इसके उलट एक बार फिर भारत भूमि में, हिन्दू सत्ताधीशों के राज में, सनातन धर्म को ही उन शिकारी विचारधाराओं के समक्ष असहाय छोड़ दिया गया। यह कितनी बड़ी विडंबना और मूर्खता थी, इसे अभी समझा तक नहीं गया है। कश्मीर से हिन्दुओं का नाश उसी नीति-विस्तारवादी आक्रामक विचारधाराओं के समक्ष हिन्दुओं को असहाय छोड़ देने की नीति का ही एक परिणाम हुआ। यह ठीक से देख सकना चाहिए।

एक ओर आक्रामक मजहब और दूसरी ओर स्वसंतुष्टि सनातन धर्म के प्रति जो तटस्थ नीति स्वतंत्र भारत की सत्ता‍ ने अपनाई, वह सेकुलरिज्म भी न था। यह बाघ और गाय के बीच तटस्थ ताथी, जिसमें कश्मीरी हिन्दुओं का विनाश पहली बलि है।

5. श्री अरविन्द ने 1936 में ही चेतावनी दी थी कि यदि उचित कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर से हिन्दुेओं का सफाया हो जाएगा। ऐसी स्पष्ट चेतावनी और अंतहीन अनुभवों के बावजूद भारत के हिन्दू नेताओं, चिंतकों ने सही निष्कर्ष नहीं निकाला। उन्होंने विस्तारवादी विचारधाराओं का चरित्र, स्वभाव ठीक से समझ कर अपने कर्तव्य निर्धारित नहीं किए। स्वधर्म में संतुष्टट रहते उन्होंने कभी पर-धर्म को गहराई से समझने का यत्न नहीं किया। कश्मीर से हिन्दुओं का विनाश और बंगाल, केरल, असम आदि में भी उसी दिशा की झलक इसी का परिणाम है।

भारत में प्रचलित सेकुलरवाद हिन्दू संस्कृति के प्रति स्थाई शत्रुभाव से भरी आक्रामक विचारधाराओं को प्रोत्साहन देने के सिवा कुछ नहीं कर रहा है। ऐसे सेकुलरवाद से छुटकारा पाना हिन्दू समाज का प्रधान कर्तव्य होना चाहिए। हमारे वामपंथी शायद इसे नहीं मानेंगे। किन्तु क्या  राष्ट्रवादी भी इसे समझते हैं ?

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