मंगलवार, 12 सितंबर 2017

राजा का न्याय

धार राजा का एक उद्यान आम के पके फलों की खुश्बू से महक रहा था। मार्ग पर जाते हुये वनवासी (भील) की दृष्टि में वह आम पके फल बरवस आ गये। वनवासी ने कुछ आम नीचे गिरा लिये और इत्मीनान से वहीं बैठकर रसास्वादन लेने लगा। वह अनभिज्ञ था, निश्चिंत भी पर थोड़ी ही देर में राजा के नियुक्त उद्यान रक्षकों ने उसे रँगे हाथों पकड़ लिया।

उद्यान रक्षक, हाथ बाँधकर वनवासी को राजा के समीप ले गये। राजा ने बिना अनुमति के उद्यान में प्रवेश पर कड़ी सजा मुकर्रर कर रखी थी, पर इस वनवासी का अपराध कुछ अधिक ही था। रक्षक आश्वस्त थे, वनवासी को कठोर दण्ड और उन्हें इनाम मिलेगा।

राजा ने रक्षकों को तो इनाम दिया पर वनवासी को क्षमा माँगकर छोड़ दिया। ऐसे न्याय को देख सुनकर खचाखच भरे दरबार में प्रश्नों से भरा सन्नाटा छा गया। हर आँख कठोर सजा के लिये प्रसिद्ध राजा से एक ही प्रश्न पूछ रही थी कि अब बगीचे से राहगीरों को फल तोड़ लेने की आजादी हो गयी है क्या?

सिंहासन पर विराजमान राजा ने दरबारियों से मुखातिब होते हुये कहा कि प्रिय स्वजनो! आज पहली बार किसी राह चलते वनवासी ने हमारे बगीचे के हमारी इजाजत के बिना फल तोड़े हैं। आप सभी को मैं यह बताना अपना फर्ज़ समझता हूँ कि मैंने उसे सज़ा क्यों नहीं दी। माफ़ी क्यों माँगी?

दरबारियों के कान राजा के उत्तर को सुनने के लिये टक टक करने लगे। गंभीर और आत्मविश्वास से भरी आबाज़ सिंहासन की सीमा पारकर पूरे दरबार में साँय साँय करती हुई गुंजायमान होने लगी। एक सन्नाटा, क्या हुआ चोरी के नियमों में ऐसी शिथिलता उन्होंने कभी न देखी थी।

वनवासी वनों के स्वामी हैं,हमने उनके वन पर अपना अधिकार कर लिया है। वनवासी इस बात से अनभिज्ञ था। उसे यही पता था कि पके फल वह तोड़ कर खा सकता है। अभी तक उसने प्रकृति पर एकाधिकार न किया औन किसी को ऐसा करते देखा। वह चोरी नहीं कर रहा था, अपने जंगल के फल तोड़ कर आराम से खाने लगा, तभी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया।

सिपाहियों को उनके कर्तव्य पालन का इनाम दिया गया और वनवासी जो इसवन वन का नैसर्गिक मालिक है उससे हमने क्षमा माँगी। यदि मैं ऐसा नहीं करता तो अन्याय होता और वनवासी सोचता रहता कि आखिर उसे दण्ड किस बात का दिया। अपनी जरुरत से अधिक का संग्रह न करनेवाले प्रकृति के असली संरक्षक यही हैं, हम तो उसपर अधिकार करनेवाले हैं।

राजा ने आगे कहा कि जिस दिन हम वनवासियों पर अपने नियम चलाना शुरू कर देंगे उस दिन से शान्ति खतम हो जायेगी अत: मेरे राज्य में वनवासियों पर मेरे बनाये नियम लागू नहीं होंगे। नरवासियों पर ही मेरे कानून लागू  रहेंगे। सन 1827 ईस्वी तक वनवासी राजाओं के नियमों मुक्त एवं स्वतंत्र सत्ता के स्वामी की  तरह रहे।

अंग्रेजों ने वनवासियों की स्वतन्त्रता को छीन लिया तभी से वनवासियों को बदनाम करने का दौर शुरू हुआ। उनको बदनाम करने का यह दौर हॅालीवुड की फिल्मों से बॅालीवुड की फिल्मों से होते हुये पूरे भारत में फैल गया।

हमारे ही पूर्वजों को हमने ही न जाने क्या क्या कहा, उन पवित्र आत्माओं को समझे बिना उन पर कैसी  कैसी विपदा आई,सुनकर रोंगटे खड़े हो जायेंगे। आवश्यक है भारतीय अरण्य संस्कृति के जन्मदाताओं को जानने और समझने की।
महेश शर्मा
शिवगंगा झाबुआ

शनिवार, 9 सितंबर 2017

इस्लाम को जानिये – ६

इस्लाम को जानिये  – ६

पिछली पोस्ट का अंत इस प्रश्न के साथ हुआ था कि  –

१ कुरान को फिर ठीक प्रकार से कैसे समझा जाए ? 

कुरान को ठीक प्रकार से समझने के लिये मुहम्मद पैगंबर के जीवन की ओर दृष्टि डालना होगी क्योंकि इस्लाम में जितना महत्वपूर्ण स्थान कुरान का है, उतना ही महत्वपूर्ण स्थान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन का भी है| पैगम्बर मोहम्मद ने अपने जीवन में जो भी किया वो अल्लाह के सन्देश के अनुसार ही किया| इसलिए पैगम्बर मोहम्मद का जीवन कुरान में कही गई बातों का जीवंत रूप है |

पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे में अत्यंत विस्तार से मुस्लिम विद्वानों द्वारा लिखा गया है | पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे में या उनके द्वारा किये गए कार्यों के बारे में सम्पूर्ण मुस्लिम जगत में कोई असहमति नहीं है| पैगम्बर का जीवनचरित्र सम्पूर्ण मुस्लिम जगत के लिए अनुकरणीय है, ऐसा इस्लाम का मानना है|

कुरान को अल्लाह द्वारा भेजा गया है, इस कारण से कुरान की पवित्रता एवं प्रामाणिकता मुस्लिमों की दृष्टि में विवाद से परे है| पैगम्बर मोहम्मद का जीवन कुरान के अनुसार होने से उनकी हरेक उक्ति तथा कृति मुस्लिमों के लिए अनुकरणीय है| इस्लाम का मत यह है कि उनका आचरण , बोल-चाल आदि अल्लाह की इच्छा, प्रेरणा तथा मार्गदर्शन के कारण ही हुआ है | यही कारण है कि मुहम्मद पैगंबर को जानने के बाद कुरान को समझना कुछ आसान होगा

पैगम्बर मोहम्मद की दो महत्त्वपूर्ण बातें- उक्ति और कृति हैं। दोनों का विवरण देने वाले ग्रन्थ को ‘अल – हदीस‘ कहा जाता है| यही कारण है कि कुरान में दिए गए किसी सन्देश के बारे में यदि स्पष्टीकरण न हो या और अधिक विस्तार से समझना हो तो ‘अल-हदीस’ का सहारा लेना पड़ता है | गैर मुस्लिमों के लिए सभवतः ‘अल-हदीस’ नया शब्द हो, लेकिन मुस्लिमों के आचरण एवं व्यवहार को निर्धारित करने में इसका बड़ा योगदान है |

इसका सीधा सा अर्थ है कि , किसी विषय के सम्बन्ध में पैगम्बर मोहम्मद ने अपने जीवन में क्या किया था यह मुस्लिमों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, भले ही ऐसा कोई निर्णय आज की परिस्थिति में करना हो | यही कारण है की १४०० वर्ष बीत जाने के बाद भी ‘कुरान’ और ‘अल- हदीस’ मुस्लिमों के लिए उतने ही प्रासंगिक है जितने वे १४०० वर्ष पूर्व थे। यह बात कि समय बदलता है, तो संदर्भ भी बदलते हैं। फिर भी आचरणगत निर्णय लेने के लिये समय के साथ किसी भी नए बदलाव या परिवर्तन की इजाजत इस्लाम नहीं देता। अल हदीस में यह सब मिलता है। पर गैर मुस्लिमों केलिये अल हदीस नया शब्द है। जिन्होंने अल हदीस के विषय में जाना नहीं वह कुरान की बातें करें, शोभा नहीं देता।

प्रश्न यह उठता है कि –

१ क्या ‘हदीस’ भी ‘कुरान’ की तरह ही महत्वपूर्ण है ?

............................................क्रमशः

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

Msjhabua@gmail.com

रवीश जी बहुत अच्छा लिखने के लिये बधाई, आप बोलते भी अच्छा हैं और लिखते भी अच्छा हैं परन्तु क्या अभी आपने जो लिखा वह सही लिखा, नहीं वह सही नहीं है। हत्या पर कोई जश्न नहीं मना रहा है, हत्या पर सदैव राजनैतिक रोटी सेकते हैं उनका मखोल जरूर उड़ाया ज रहा है, मखौल आपका भी उड़ रहा है क्योंकि आप भी पक्षपात भरी बातें करने के, उन्हें जायज ठहराने के, मासूमियत भरी बातें कहने उसपंथी कुनवे के मुख्य किरदार हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है, आप भी अपनी विचारधारा रख सकते हैं। आप मासूम से सबाल खड़े करते इस पत्र में आपने माँ बाप को सचेत करने का काम किया, यह काम आप करना ही चाहिये पर यह भी ध्यान रखिये दूसरे भी माँ बाप से अपने बच्चों के लिये संदेश दे ही रहे होंगे। दोनों के संदेश लेने के बाद निर्णय तो माँ बाप को है, उनके निर्णय को विनम्रता से स्वीकार करने का आपका मन होना चाहिए, अभी आपके अन्दर वह उँचाई आना बाकी है। आपकी एक फेंक आइडी देखी आपके हवाले से उसमे लिखा कि मैं दुखी हूँ क्योंकि मेरा प्रधानमंत्री गुण्डा है, वह आपकी आइडी नहीं ही होगी पर लोग समझने तो यह भी गये कि रवीश कुमार भी पिछले तीन साल नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से अपना आपा खोते जा रहे हैं, आप आपा भी इन्शान हैं आपा खो सकते हैं पर लोग आप से यह अपेक्षा रखते हैं कि आप उनके आदर्श बने रहैं। आनावाला समय आपके लिये असहनीय ही रहेगा क्योंकि 1920 से जब से भारत में कम्युनिस्ट पार्टी गठित हुई भारतीय संस्कृति पर एक तरफा प्रहार चल रहा है, क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। गोधरा होगा तो अहमादाबाद की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। केरल की नृशंस हत्यायें कभी आपकी अपील का कारण नहीं बनी और न कभी बनेंगीं। हत्या के बाद की करुणा को आपने पहले मारा खूब मारा, इस हत्या में कह नहीं सकते किसका हाथ है पर आपने बिना जाँच के फैसला देनेवालों की हौसला अफजाई में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। माओवादी हिन्सा में ही विश्वास रखते हैं पर भारतीय चेतना जिसे हिन्दुत्त्व भी कहते हैं शान्तिप्रिय है। आप जिस कुनवे से संबंधित हैं वह हिंसा करते हुये अभी तक अहिंसक बने रहने में सफल रहा पर अब उस दरिंदगी भरे चेहरे से पर्दा उठ गया है। भारत में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बीजेपी और संघ के कारण नहीं हैं, आप जैसे एक तरफा भारतीय संस्कृति का चीर हरण करते रहे उस कारण है। एक दिन तो ऐसा आना ही था जब कंस की जेल के प्रहरी सो गये, कृष्ण को मथुरवासियों ने बचा लिया था। आजादी के बाद के इन सालों में भारतीय सं्स्कृति के साथ जो बलात्कार आपके विचारसमूह ने किये, उसकी परिणिति से हिन्दुत्त्व का उभार हुआ है। समय साक्षी है। समय सब देख रहा है।