रविवार, 8 अप्रैल 2018
शुक्रवार, 30 मार्च 2018
हनुमान जयंती प्रसंग
सही मायने में हनुमान जी उच्च विद्या-विभूषित बल-संपन्न स्फूर्तवान युवक थे, उनकी बुद्धि प्रखर थी तथा वह प्रत्युत्पन्नमति बुद्धि के धनी थे। खतरों से खेलने में वह कदापि नहीं झिझकते थे। आज हनुमान जयंती है इस अवसर पर सबजन हनुमान जी को सही रूप में समझेंगे तो ही हनुमानजी जैसे गुणनिधान महापुरुष भारत वासियों के जीवन को आलोकित करेंगे अन्यथा उनका एक भी गुण कोई गृहण नहीं कर सकता।
आज हनुमान जयंती है। हनुमानजी को लेकर उनके जीवन से संबंधित अनेक भ्रान्तियाँ भारत में प्रचलित हैं उन में से एक दो भ्रान्ति की यहाँँ चर्चा है।
"वह बन्दर थे और पहाड़ उठाकर लाये थे"।
वानर और बन्दर में बहुत अंतर है। वानर नर हैं और बन्दर पशु। संस्कृत में नाम को जानने के अनेक तरीके हैं, उनमैं एक तरीका यह है कि स्थान के नाम से पहचान जैसे नगर र् वन्त दो स्थानों के नाम हैं। नगर के निवासी को नागरिक या नागर कहते हैं। वन के निवासी को वानरिक या वानर कहते हैं।
अयोध्या नगर क्षेत्र है इसलिए राम को नागर कहते थे। नागर या नागरिक प्रचलित नाम हैं। इसी तरह वानर या वानरिक शब्द भी प्रचलित हैं। हनुमान वन निवासी थे। वन के निवासी होने से उन्हें वानर ओर राम को नगर के निवासी होने के कारण नागर कहते थे। नागर और वानर का मेल ही अत्याचार से मुक्ति का कारण बना।
कुछ लोग कहते हैं कि वन में जानवर रहते हैं इसलिए वानर का अर्थ बंदर ही ठीक है। इस कथन पर आप जरा सोचो क्या नगर में जानवर नहीं रहते हैं, जानवर तो नगर में भी रहते हैं। फर्क इतना ही है कि वन की तुलना में नगर में जानवरों की संख्या कम होती है। आज के हिसाब से देखा जाए तो नगरों में ही जानवर अधिक हैं, वनों में तो जानवर बचे ही कहाँ हैं? बहुत कम हो गए हैं।
हनुमान के पिता केसरी थे वह किष्किन्धा राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री थे। केसरी के पिता पद्माकर थे वह अत्यधिक विद्वत्ता के कारण भी प्रसिद्ध थे। हनुमान जी भी उच्चशिक्षित और संस्कारों से परिपूर्ण थे। किष्किन्धा एक बहुत बड़ा राज्य था। उस राज्य की सीमायें नर्मदा तक फैलीं हुईं थीं।
साहित्य में अलंकारों का प्रयोग होता है। साहित्य का आभूषण अलंकार ही होते हैं। अलंकारो के प्रयोग को भावार्थ करते समय सही रूप में समझा या समझाया जाता है। साहित्य में शब्दों के पर्यायवाची भी प्रयुक्त होते हैं, साहित्यिक अज्ञानता के कारण अनेक जगह अर्थ का अनर्थ हुआ है। संदर्भों को सही रूप में नहीं समझा गया है।
हनुमान जी पूँछ रहित बलिष्ठ शरीर के उत्तम ज्ञान संम्पन्न युवा थे। वानर नाम से उल्लिखित वह किसी भी रूप में कोई बन्दर नहीं थे। सग्रीव अंगद, द्विद मयंद, नल, नील , गय, गयंद आदि सभी वनाच्छादित राज्य के सुयोग्य नागरिक थे। साहित्य में प्रवचन की परम्परा ने अज्ञानी प्रवचनकारों ने ऐसी भ्रान्तियों को और अधिक बल दिया। भारत में अधिकांश प्रवचन कार साहित्यिक ज्ञान से अछूते तथा इतिहास के मर्म को न समझनेवाले रहे, यही कारण रहा कि कथाओं में भ्रान्तियाँ पुष्ट होती गयीं।
हनुमान जी पहाड़ उठाकर लाये थे यह भी एक भ्रान्ति ही है। अपने कंधे पर किसी आकार का पत्थर रखकर देखो फिर अंदाज लगाओ कि हनुमान जी द्वारा लाया गया, यदि सही में पहाड़ ही होगा तो वह 25-30 किलो से अधिक बजन का पत्थर नहीं होगा। पहाड़ उठाना भी एक मुहाबरा ही है। उसी अर्थ में इसे समझा जाना था। चमत्कार पहाड़ उठाने में नहीं ,चमत्कार तो यह था कि वे समय रहते जड़ी बूड़ी ले आये, दस पाँच प्रकार की एक जैसी दिखनेवाली जड़ी बूटियों को वह इकट्ठा करके ले आये।
चमत्कार के संदर्भ में बात कही जाये तो धरती का अपनी धुरी पर घूमना एक बहुत बड़ा चमत्कार है पर भारत में धरती के इस तरह घूमने को चमत्कार नहीं माना जाता, कोई व्यक्ति अपने हाथ हिलाकर हाथ की सफाई से कुछ वस्तु निकाल दे तो उसे चमत्कार माना जाता है। भारत में अच्छाइयाँ हैं पर अज्ञानता भी कूट कूट कर भरी हुई है। अभी भी भारत में हर जगह अज्ञानता का साम्राज्य फैला हुआ है। विदेशों से आनेवाले यात्रियों ने भारत की अच्छी बुरी दोनों बातों का उल्लेख किया है।
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018
कुछ सपनों के मर जाने से
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।
शनिवार, 17 फ़रवरी 2018
राष्ट्र के #नवनिर्माण में अपनी #भूमिका निभा सके।
दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से निजात दिलाने के सूत्र दे सकने में पूर्णतः सक्षम #भील समाज की प्राचीन और आजमायी हुई महान परम्परा #हलमा , जिसे #शिवगंगा ने सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत ही साकार रूप सहित समाजहित में धरातल पर विगत लगभग एक दशक में ठोस रूप में पुनर्स्थापित कर दिखाया हैं।
#हलमा का कार्य देखने , समझने और अपनाने की सदईच्छा रख देश के हर कोने से तकनीकी विशेषज्ञ , पर्यावरणविद , न्यायविद और विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी नियमित रूप से झाबुआ आने लगे हैं।यूँ तो #आदिवासी बहुल #झाबुआ और #आलीराजपुर जिले में वर्षभर शिवगंगा की गतिविधियाँ संचालित होती हैं लेकिन जिला मुख्यालय झाबुआ पर होने वाला सालाना #हलमा आयोजन आज 16 और कल 17 फरवरी 2018 को कुछ खास सन्देश देता नज़र आता हैं।आज निकली गैती यात्रा में हजारो की संख्या में बच्चे , किशोर , युवा और वृद्ध महिला पुरुष जब नगर के मुख्य मार्गो से गुजरे तो लगभग प्रत्येक हाथों में परमार्थ की भावना से प्रेरित गैती - फावड़ा और तगारी थे। जो नगरवासियों का आह्वान करते नज़र आए। जिले भर से एकत्रित यह हजारो हाथ अपने गाढ़े पसीने की कमाई खर्चकर बिना किसी लालच या लाभ की आशा के बिना परमार्थ की भावना से सराबोर हो एकत्रित हुए। जो झाबुआ नगरवासियों के लाभ के लिए नगर से सटी हाथीपावा की टेकरियों पर सतत 3 - 4 घण्टे #श्रमदान से अपना पसीना बहाकर जल संचय की हजारो जल संरचनाएं बनाकर सौगात प्रतिवर्ष देते हैं।जो करोड़ो लीटर जल भूमि में संचित कर नगर के भूजल स्तर को बढाने में अहम भूमिका निभाने लगा है।आज निकली गैती यात्रा का नेतृत्व महामंडलेश्वर संत श्री प्रणवानन्द जी महाराज , आदिवासी सन्त श्री कानू जी महाराज , पूरे विश्व मे भारत माता की आरती सहित अपनी कला के माध्यम से भारतीय धर्म-संस्कृति की ध्वजा लहराने वाले अंतर्राष्ट्रीय कलाकार किन्तु ठेठ देशी सहज व्यक्तित्व बाबा सत्यनारायण मौर्य ने किया। कुछ वर्ष पूर्व दो - दो की पंक्ति बनाकर निकलने वाली गैती यात्रा का इस बार का स्वरूप इतना वृहद रहा कि बहुत लम्बी दूरी तक सड़कों की सम्पूर्ण चौड़ाई चलने के लिए कम पड़ती नज़र आ रही थी। यह परमार्थ की भावना #शिवगंगा के माध्यम से बहुत वृहद रूप में तेजी से विस्तारित होती जा रही हैं। इसके स्पष्ट प्रमाण गैती यात्रा के बाद कॉलेज मैदान पर आयोजित धर्म सभा मे दिखाई दिए।यहाँ विद्वजनों ने देश के विभिन्न कॉलेजो और #IIT संस्थानों से आए विद्यार्थियों से आह्वान किया कि देशभर में आप जहाँ भी जाए अपने - अपने कर्म क्षेत्र में #शिवगंगा का यह संदेश ना केवल प्रसारित करे बल्कि इस #हलमा संस्कृति को वहाँ धरातल पर समृद्ध रूप देकर आपके यहाँ आने को सार्थकता प्रदान करे।उन्होंने #हलमा को एक त्यौहार बनाने का आह्वान तक कर दिया ताकि यह देश की #संस्कृति में #परमार्थ #समृद्धि के सूत्र संचारित कर #राष्ट्र के #नवनिर्माण में अपनी #भूमिका निभा सके।
मंगलवार, 9 जनवरी 2018
आधुनिक काल के एक ऋषि::प्रोफेसर केबीएल पाण्डेय
दिल्ली, मुम्बई और ऐसे ही महानगरों के लोग जब ट्रेन से मुरेना के पास से गुजरते हैं तो बीहडों को खिड़कियों से झाँक कर ऐसे देखते हैं जैसे वहाँ डाकू लोग पटरी के पास बैठे रहते हों। चलती गाडड़ी में वे सुरक्षित भी हैं थ्रिल का मजा लेने में।
बाढ़ देखने में भी आनन्द पाने वालों से आप संवेदना की अपेक्षा कर सकते हैं क्या?
वही बात उन लोगों की है जो आदिवासियों के बारे में विश्लेषण विहीन नासमझ धारणा बनाये हैं। वे अब तक उन सुनी सुनाइयों में पडे हैं जिनके अनुसार आदिवासी अपराधी, नशेड़ी, कृतघ्न, अविश्वसनीय हैं। उन्हें उनकी बेहद अनुशासित सामाजिक प्रथाएँ मुक्त कामपरक या जंगली लगती हैं। वे नहीं जानते कि इन आदिवासियों की सामाजिक संरचना में कोई संविधान निहित है।
आदिवासियों के तीर कमान और अन्य जीवन से जुड़ी चीजें अभिजात लोगों के ड्राइंग रूम सजाने में टँगी रखी हैं उनके गीत, नृत्य, भद्र जनों को मजा देने के काम में आते हैं लेकिन ये भद्र जन? नहीं जानते कि श्रमिक वर्ग कला का विकास जीवन से जुड़ी वस्तुओं में करता है, सिर्फ़ कला या मनोरंजन के लिए नहीं।
न्याय परस्पर सहयोग करुणा आदि की जो सुचिन्तित परम्परा उनकी किताबों में है उनके एक दो पन्ने ही हम पढ़ लें तो शायद मनुष्यता के कुछ करीब पहुँचें। युगों के निर्मम शोषण और उपेक्षा के शिकार हैं ये। उनकी सरलता उनकी विवशता अभावग्रस्तता को शताब्दियों से लूटा जाता रहा। उन्हें मुख्य धारा में लाने का जो विचारहीन दौर चलाया गया उसमें उनके संसाधन व्यापारियों, नव जमीदारों और ठेकेदारों ने हड़प लिये।
सड़कें उनके उतने काम नहीं आयीं जितनी बाहरी घुसपैठियों के लिए। जंगल आरा मशीनों ने हलाल कर दिये, जमीनों पर बडों के खाते खुल गये। सरकारों के पास उनके विकास का कोई प्रारूप था ही नहीं। उनके पास कभी कभी दया के कुछ दाने छिड़क कर गौरवान्वित होने के समारोह भर थे। इतने बड़े समाज को रचनात्मक और संश्लिश्ट चेतना के तौर पर समझा ही नहीं गया।
उन्हें लोकतंत्र के सहगान में शामिल न करके उनसे रैलियों और जुलूसों में नारे लगवाये गये। लेकिन अपने ही इतिहास के पन्ने पलटते हुए झाबुआ के भील भिलाले पटेलिया अब हलमा परम्परा के द्वारा अपने विकास को आकार दे रहे हैं। पानी, पेड़, पहाड़ के सामूहिक लोकगीत इसी तरह रचे जाते हैं।
शुक्रवार, 5 जनवरी 2018
महान है जनजाति समाज
धारणा ऐसी ऐसीं
ये लोग तो कटी उँगली पर भी नहीं मूतते हैं ?
पर सत्य कुछ और ही निकला...
17-18 फरवरी को हाथीपावा पर हलमा है। हलमा में आने के लिए अभी तक 400 गाँव के 20 हजार से अधिक लोगों ने पंजीयन करा लिया है। हलमा में आने की मुख्य प्रेरणा धरती माता की प्यास बुझाना है, परमार्थ का भाव लिये झाबुआ अलीराजपुर से माता बहन बेटी, पुरुष हजारों की संख्या मे अपने अपने गाँवों से स्वयं के खर्चे पर चलकर आते हैं।
ग्रामीण परिवारों को हाट बजार के कारण 6-7 घंटे घर से बाहर निकलना तो आसान रहता है पर दो दिन घर से बाहर निकलने के लिये उन्हें बहुत बड़ी योजना बनाना होती है। जानबरों को भोजन पानी और घर के अत्यधिक बुजुर्गों की सेवा जिम्मेदारी घर के एक सदस्य को सोंप कर हलमा में आना आसान नहीं होता। पर्यावरण के संवर्धन से जन जन के चेहरे पर खुशहाली आयेगी, केबल और केबल यही भावना उनसे आदिवासी बन्धुओं से यह बड़ा काम करवा लेती है।
जनजाति के ये लोग कितने महान हैं? हलमा का आयोजन न हुआ होता तो इन आदिवासी बहन भाइयों के उच्चादर्शों को जानने से दुनियाँ के लोग बंचित ही रह जाते। अभी भी हलमा देखने के बाद अपने आपको सुसंस्कृत माननेवाले लोग, इन्हें सुधरजाने का उपदेश देने से नहीं चूक जबकि उन तथा कथित सुसभ्य के लोगों के सामने यही आदिवासी बच्चे बूढ़े सभी एक साथ मिलकर बिगड़े पर्यावरण को संतुलित करने के लिये परमार्थ केलिये एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे होते हैं।
जनजाति के इन निष्काम कर्मयोगियों को पता है कि मानव के अत्यधिक उपभोग करने से दुनियाँ का पर्यावरण असंतुलित हो गया है, पर्यावरण का संतुलन जल जंगल जमीन के संवर्धन और संरक्षण से होगा। इसका निदान मिल जुलकर श्रम-सीकर बहाने से होगा। फिर भी इन परमार्थी सज्जनों से पूछा जाता है कि आपको इससे क्या फायदा होगा? हलमा आये लोग इस बेतुके प्रश्न का क्या उत्तर दें? चुप रह जाते हैं। यद्यपि
"झाबुआ अलीराजपुर के जनजाति समाज को अत्याधुनिक एवं युगानुकूल ज्ञान की, प्रचुर मात्रा में संसाधनों के उपलब्धता की, नगद धन की, सरकारी योजनाओं को वास्तविक रूप में उन तक पहुँचने की महती एवं सख्त जरूरत है।"
झाबुआ में रहते हुये मुझे 20 साल होने को आ गये। दस साल से अनवरत मैं कुछ बाते सुनता रहा हूँ, उन पर विचार करता रहा हूँ, मुझे जो बाते बताई गयीं कि ये आदिवासी लोग (भील, भिलाला पटैलिया) अत्यधिक स्वार्थी समाज हैं।
इन बातों, उलाहनों को सुनते हुये मैंने बार बार दो तरह के दृश्य देखे। एक शहरी परिवेश और एक झाबुआ के गाँवों का दृश्य। शहरों में झाबुआ के गाँवों में जनजाति समाज के प्रति धारणाओं की झूँठी जानकारियाँ मिलती और दूसरी तरफ गावों में अत्यधिक प्रेम परोपकार के व्यवहार को आचरण में चरितार्थ होते देखने का मौका मिलता। बड़ा असमंजस रहता, यह सही या वह सही? सत्य जानने की जिज्ञासा बलवती होती गयी।
शहरों के बहसंख्य निवासिओं के मन में जनजाति समाज के प्रति बनीं धारणायें जो सुनी सुनाईं प्रायः असत्य ही हैं, बहुत दुखद हैं। वे असत्य धारणायें सामाजिक विषमता को जन्म देती रहतीं हैं। शहरी लोगों के हृदय में भी झाबुआ के जनजाति समाज की सही तस्वीर बनना सामाजिक सहअस्तित्त्व के लिए यह बहुत आवश्यक काम भी है। धारणाओं की कुछ बानगियाँ पढ़िये...
शहरों में जो भी लोग हैं तथा जनजाति समाज के प्रति धारणा पाले हुये हैं, बुरे लोग नहीं है, वे सभी मन बचन कर्म से अच्छे लोग हैं पर आदिवासी समाज के प्रति उनकी धारणायें एक से एक विचित्र हैं, आप भी उन्हें जानिये।
अरे! .........
1- ए तो दारूकुट्टे! इनसे आप परमार्थ करबाओगे? ये कटी उँगली पर तो मूतते नहीं हैं।
2- इनसे पेड़ लगबाओगे? ये पेड़ काटना जानते हैं, इनके बापने भी कभी एक पौधा नहीं लगाया।
3- इनको झगड़े टंटे के अलावा कुछ भी आता नहीं है।
4- ये मजदूरी करके कुछ कमा धमा लेते हैं फिर ये किसी की नहीं सुनते।
5- ये क्या सुधरेंगे? इन्हें दारू पीकर कुर्राटी लगाना आता है।
6- दहेज-दापा ने इन्हें बरबाद कर दिया।
7- ये लड़कियों को औने पौने दाम में बेच देते हैं
8- 'भगौरिया हाट' लड़की को भगाकर शादी करने का मेला है।
एक महिला जो लेक्चरर भी हैं, ने तो यहाँ तक कह दिया कि हम इनको अच्छी तरह जानते हैं, आप नहीं जानते इन्हें, सरकार ने भी इन्हें सर पर चढ़ा रखा है, आप भी इनकी सेवा में लगे हो, देखना शर्मा जी मैं जिंदा रहूँगी, देखना यही आपका गला काट देंगे, इनसे ज्यादा धोखेबाज कोई नहीं होता।
सोरवा में एक व्यक्ति बोला ए लोग जिन्दा आदमी का कलेजा निकालकर खा जाते हैं। सोरवा एसिया का सबसे बड़ा आपराधिक क्षेत्र है। माछलिया घाट से चले पिटौल निकल तो तो कहते-जान बची और लाखों पाये। दातरे (हँसिया या दराता) में म्यान नहीं भीलों में ज्ञान नहीं।
यह सब बातें बिना प्रमाण के एक कान से दूसरे कान होती हुईं धारणाओं के रूप में घनीभूत हो गयीं और झाबुआ अंचल को उस रूप में बताती रहीं जिसका झाबुआ के जनजाति समाज का उन धारणाओं से कोई सरोकार नहीं। आज भी ऐसी धारणायें पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं हैं, आंशिक कभी जरूर आई है।
हलमा परम्परा भील भिलाला पटैलिया समाज की महान सामाजिक परम्परा है। झाबुआ को सही रूप में समझने के लिये हलमा कार्यक्रम भी एक मौका है। झाबुआ आलीराजपुर क्षेत्र में ऐसी अनेक श्रेष्ठ परम्परायें हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। झाबुआ के जनजाति समाज को सिखाने की जगह झाबुआ को समझने और सीखने की जरूरत है, यहाँँ उनके आचरण से उपदेश गृहण करने जरूरत है।
अयोध्या में राम, मथुरा में एक कृष्ण, काशी में विश्वनाथ के दर्शन केलिये तीर्थयात्री जाते हैं। झाबुआ में आइये, गाँवों में रहिये।17-18 फरवरी2018 को राम, कृष्ण, विश्वनाथ का परमार्थी रूप हलमा के माध्यम से प्रत्यक्ष देखिये।