मंगलवार, 4 जुलाई 2017

कॉमरेड मंगलेश डबराल के नाम एक खुला खत -------------------------------------------------------

कॉमरेड मंगलेश डबराल के नाम एक खुला खत::- अग्निशेखर
----------------------------------------------------------------------------------------------

''मुझे अफसोस है कि आपने कल अपने एक पोस्ट में विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं की त्रासदी पर जले पर नमक छिड़का है. आपने बहुत पीड़ा पहुँचाई है. यह आपसे अपेक्षित न था.
मेरा संकेत आपके विगत दस वर्षों में कश्मीर में मारे गये कश्मीरी हिन्दुओं की संख्या जानने की ओर नहीं है, यह जानना किसी का भी अधिकार है. चाहे कारण कोई भी हो.
मेरी घोर आपत्ति आपके उस महाझूठ से है जो आपने उक्त पोस्ट से छिडे वाद-विवाद के दौरान बड़ी शान और इत्मीनान से इन शब्दों में लिखा है -
"जी हाँ, मैं कश्मीर गया था. जब दो हिन्दुओं की हत्या के बाद तब के राज्यपाल और भाजपा के चहेते जगमोहन ने फौज के ट्रकों से हिन्दू परिवारों को जम्मू छोड़ा था. असली खलनायक जगमोहन थे. मैंने इस पर एक लंबी रपट लिखी थी."
इससे बड़ा सफेद झूठ क्या हो सकता है!
अगर आप यह नहीं लिखते कि आप कश्मीर गये थे और आपने इसपर लंबी रपट भी लिखी थी, यकीन मानिए मैं आपके कहे को उसी तरह इग्नोर करता जिस तरह 1990 में दिल्ली के मानवाधिकारवादियों की कश्मीरी पंडितों की जलावतनी और उसके असली कारणों पर एकतरफा, मनगढंत रिपोर्ट को पीड़ित विस्थापितों ने किया था. यह लाखों कश्मीरी विस्थापितों के जीनोसाइड और उनके एग्जोडस का अकल्पनीय अपमान था. और जैसे हिटलर के गोयबल्ज़ की आत्मा उनमें उतरी थी.
इसी तरह आप जैसा कवि और वरिष्ठ साहित्यकार आज 27 वर्ष के बाद इतना भयंकर झूठ बोलेगा, यह अफसोसनाक है. आप असहमति के हकदार हैं, लेकिन एक भयावह त्रासदी के कारणों को आप इतनी संवेदनहीनता के साथ झुठलाएंगे, और अपने भाट और चाटुकारों की वाहवाही से फूले नहीं समाएंगे, ऐसा तो न सोचा था. आपके कवि और आपके व्यक्ति के बीच इतनी चौड़ी खाई का होना दुखद है.
वैसे भी आपने मुझ जैसे कई अपने अच्छे पाठकों और प्रशंसकों को तब पहला बड़ा झटका दिया था, जब सुब्रतो रॉय की 'राष्ट्रीय सहारा' में डॉ नामवर सिंह के कदम से कदम मिलाकर आप अपना वामपंथ ताकपर रखकर नौकरी करने गये थे. और सुबह शाम "सहारा प्रणाम" ठोककर दिहाडी पक्की करते. याद होगा मैंने आपको इस पर एक छोटा सा पत्र भी लिखा था.
यह तो नहीं झुठलाएंगे आप कि मैं विगत 27 बरस से जलावतनी में हूँ. भले ही मेरे क्या, लाखों कश्मीरी विस्थापितों के त्रासद अनुभव झुठलाइए और यह कहते फिरिए कि कवि अग्निशेखर सहित कश्मीर मूल के सैकड़ों कलाकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, शायरों, चित्रकारों और संगीतकारों को भी राज्यपाल जगमोहन ने फौज की गाड़ियों में जम्मू छोड़ा. कितना बड़ा मज़ाक है!
आप यह भी नहीं झुठलाएंगे न कि विस्थापित कवि अग्निशेखर आपके पास जनसत्ता कार्यालय में अक्सर आता था और आपसे अपने अनुभव साझा करता था. कई कई बार आपने अग्निशेखर की कविताएँ भी प्रकाशित कीं. और पीछे जाएँ तो आप मेरे कश्मीर मेरे घर भी आए थे प्रयाग शुक्ल, इब्बार रब्बी के साथ. तब जो कश्मीर आपने ऊपर ऊपर से देखा था, जिस तरह मेरे मुहल्ले के पड़ोसी मुसलमान दुकानदार ने मेरे घर का रास्ता बताया था और बुबा सब्जीवाला तो साथ भी आया था. बुबा सब्जीवाला अक्सर मेरे पिता के पास आता था दुकानदारी की लिखत-पढत के लिए जो वत्सल भाव से पिता उसे बेटे की तरह जानकर कर देते थे.
तब वो अलग कश्मीर था. हालाँकि अंदर-अंदर आंच थी जो आप दो तीन दिवस के लिए कश्मीर आए सैलानी-दृष्टि से अनुभव नहीं कर सकते थे. फिर भी वो परिदृश्य इतनी द्रुत गति से और इतने नाटकीय ढंग से बदलकर घृणा तथा हिंसा से भर जाएगा, हवा इतनी हिंदु विरोधी और भारत विरोधी पाकिस्तान परस्त सशस्त्र क्रांति का सा रूप लेगी, यह सोच से परे था.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब हालात इतने खराब हो जाएँ कि आप अपवाद छोड़कर अपने बरसों के दोस्तों और पड़ोसियों से भयभीत रहने लगें भीतर-भीतर. वर्ष 1990 ऐसा ही दुर्भाग्य लेकर आया था तब.
आप इस बात को भी शायद आज नहीं झुठलाएंगे कि मैंनै आपको कितनी बार 'जनसत्ता' के उसी कार्यालय में कितने लोमहर्षक किस्से सुनाये और सुनवाये थे कि आपके चेहरे पर घबराहट तैरती. याद करिए एक दिन मेरे साथ आई एक महिला मित्र ने जब आपके चैंबर में पहले से बैठे मध्यप्रदेश के एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार से अपनी हिस्से की दास्तान सुनाने के प्रसंग में बांडीपुर कश्मीर की अध्यापिका गिरिजा रैना के कुपवारा में अपहरण, सामूहिक बलात्कार के बाद उसे आरा चौपाल पर जीवित दो फाड़ चीरने की रोंगटे खड़े कर देनी वाली घटना सुनाई थी और आपने मेरे कान में सहमे स्वर में पूछा था, "अग्निशेखर, क्या यह सच है?"
मेरी हामी के बाद आप गहरी खामोशी में चले गये थे, जो कि एक संवेदनशील व्यक्ति से अपेक्षित था.
मैंने यह एकाध प्रसंग आपको इसलिए याद दिलाया क्योंकि आपने लिखा -
"दो हिन्दुओं की हत्या के बाद तबके राज्यपाल जगमोहन ने फौजी गाड़ियों में कश्मीरी हिन्दुओं को जम्मू छोड़ा."
ऐसा कहते आपकी आत्मा को भी कोई खेद नहीं हुआ? मुझे ताज्जुब है.
आप पत्रकार के नाते एक कश्मीरी आतंकवादी दरिंदे बिटा कराटे की बीस कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याओं के टीवी पर खेदविहीन भाव से किए कबूलनामे के बारे में तो जानते ही होंगे. यू ट्यूब पर उसका वीडियो बयान देखें. कहता है कि मैंने पाकिस्तान के आकाओं के कहने पर अपने घनिष्ठ मित्र सतीश तिक्कू सहित 20 कश्मीरी पंडितों को मारा. उसके बाद गिनती भूल गया.
और आप कह रहे हैं कि दो हिन्दुओं की हत्या के बाद प्रायोजित विस्थापन हुआ.
मंगलेश जी, सरला भट्ट, सुमित्रा, आशा, पिट्टी, प्राणा गंजू, सोनी सुंबली सहित दर्जनों कश्मीरी हिन्दु स्त्रियाँ बलात्कार के बाद मार डाली गयीं. कवियों, कलाकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, वकीलों सहित सैकड़ों कश्मीरी पंडित बुद्धिजीवियों और आम जनों की बर्बर हत्याओं, खुली धमकियों, अपहरणों और घरों पर हमलों से हमारे लिए विस्थापन ही एकमात्र विकल्प बना.
विद्या रतन आसी का एक शेर है -
जैसे माहौल में जिए हम लोग।
आप होते तो खुदकुशी करते।।
आपको मैंने जनसत्ता कार्यालय में भी एकबार अपने भागने की त्रासद कहानी संक्षेप में सुनाई थी कि किस तरह मेरे मुहल्ले का ही एक दुकानदार अपने तीन-चार हथियार बंद आतंकवादियों के साथ एक शाम मुझे मारने आया था. घरों की बिजलियां बंद करवाई जाती थीं हर शाम. ब्लैक आऊट करवाया जाता. कि किस तरह मुझे जो धमकी पत्र आंगन में पड़ा मिला था, जिसमें मेरी खता थी कि मैं हिंदी में लिखता हूँ, हिंदी हिंदुस्तान की जुबान थी और भी बहुत कुछ बकवास थी.
यह कितना त्रासद है कि हमारा सच झूठ लगने की हद तक लगने वाला ऐसा सच है. लेकिन जब आप इस अवर्णनीय सच को प्रामाणिक पाएँगे तो विस्मित होकर संभवतः प्रायाश्चित से भर जाएँगे. तब तक लेकिन बहुत देर हो चुकी होगी.
कश्मीरी कहावत है -'पोज़ पजि आलम् दजि' अर्थात् जब तक प्रमाणित होगा सच तब तक भस्मीभूत होगा जग.
आदरणीय महोदय, विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के पास जो आँकड़े हैं उनके अनुसार लगभग 1200 से अधिक कश्मीरी पंडित कश्मीर में चुन-चुनकर मार डाले गये. शायद आप कहेंगे कि संख्या फिर भी नगण्य है.
राज्य सरकार ने भी इस संख्या को ढाई सौ से तीन सौ तक कम करके बताया है. 1990 के आरंभिक वर्षों में जम्मू, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, जयपुर और मध्य प्रदेश आदि जगहों पर सैकड़ों शरणार्थी कैंपों में ऐसे कितने ही परिवार थे, जिनका कोई न कोई सदस्य कश्मीर से ही गायब था. उन दिनों दरिया से कितनी ही विकृत लाशें मिलने की खबरें आतीं.
यहाँ मैं ज्याँ पाल सार्त्रे के एक प्रसंगानुकूल एक कथन को (कुमार विक्रम के सौजन्य से) उद्धृत करना चाहूँगा कि फासीवाद इससे नहीं समझा जाता कि उसके हाथों कितने लोग मार डाले गये बल्कि उसने पीड़ितों को किस तरह मारा.
"Fascism is not defined by the number of its victims, but by the way it kills them"-Jean-Paul-Satre,22/6/1953
रही बात विगत दस साल में कितने कश्मीरी हिन्दुओं की कश्मीर में हत्याएँ हुईं. निश्चित रूप से कम हुईं. क्योंकि कुछ सौ परिवार अपवादस्वरूप छोड़कर लगभग साढ़े चार लाख कश्मीरी हिन्दू परिवारों का कश्मीर से वर्ष 1990-91-92 में ही समूल सफाया हो चुका था. आपको पता होना चाहिए कि कश्मीर में आज की तारीख में कितने पंडित रहते हैं. कश्मीर स्थित हिंदू संघर्ष समिति, जिसके पहले प्रधान कम्युनिस्ट विचारधारा के मजदूर नेता हृदय नाथ वाँचू थे और उनकी आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या की थी, के अनुसार पूरी घाटी में 800 के करीब परिवार रहते हैं. एक परिवार के सामान्यतः चार सदस्य भी मानकर चलें तो 3200 के आसपास संख्या बनती है. इसके अतिरिक्त कश्मीर घाटी में प्रति वर्ष दरबार-मूव के चलते डोगरा हिंदुओं, सिखों और जम्मू के मुस्लिम सरकारी नौकरीपेशाओं की संख्या मई से अक्तूबर तक बढ जाती है. यहाँ कश्मीर ग्रीष्मकालीन और जम्मू शीतकालीन राजधानी है.
आपने सरलीकरण करते कश्मीरी हिन्दुओं के हत्यारों को लश्कर-ए-तोयबा जैसे अंतरराष्ट्रीय रिकाग्नाइज्ड टैररिस्ट ग्रुप्स के आतंकी बताया है. क्या आप जानते हैं कि 1990-91 में अधिकांश कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याएँ किसने कीं? जेकेएल एफ के हत्यारों ने जो पाकिस्तान समर्थित तो थे ही थे, लेकिन थे स्थानीय हमारे अडोसी पड़ोसी, गाँव मुहल्ले, गली कूचों और दोस्तों के दोस्त या आपके जानकार.
यह जो शुरू से लाखों लोग उनके समर्थन में जुलूसों जलसों या हर जुम्मे की निमाज़ के बाद हिंसक प्रदर्शन करते हैं, यह क्या लाहौर, पेशावर, इस्लामाबाद आदि से आई जनता होती है? आपको पता है कि विदेशी आतंकवादियों को कश्मीर में 'मेहमान मुजाहिदीन' कहते हैं.
मैं भाजपा या किसी जगमोहन का कोई भक्त न हूँ न रहा हूँ. लेकिन जगमोहन को कश्मीरी हिन्दुओं की उनकी मातृभूमि कश्मीर से बेदखली के लिए बलि का बकरा बनाना सरासर गलत और एक सुविचारित disinformation campaign का हिस्सा है. जो दिल्ली से पाकिस्तान, वाशिंगटन और लंदन तक खूब चलाई गयी. हमारे महान छद्म बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादी झूठ प्रचारित करने और सच को तोड़ मरोडकर कर दुनिया के सामने रखने के गुनाहगार हैं, जिनमें अब आप भी शामिल हो गये.
मैं यहाँ कितने हत्याकांड गिनाऊं जिनमें चुनचुनकर हिन्दुओं, सिखों को मारा गया. वन्दहामा, संग्रामपोरा, छानपोरा, छटीसिंहपोरा, गूल आदि.
आपने यह सवाल उछाला है कि क्यों कश्मीरी पंडितों ने भाजपा को अपना सरपरस्त माना जिसका आपको जवाब नहीं मिलता, बस एक अंध राष्ट्रवाद का कर्कश राग छेड़ दिया जाता है. मंगलेश जी, क्या आप सच में इस बात से अनभिज्ञ हैं या कि बन रहे हैं? अगर सच में नहीं जानते हैं तो आपकी हैरानी जायज़ है. आप जानते हैं कि पारंपरिक तौर से नेहरूवियन कहिए या गांधीवादी सोच के कश्मीरी पंडितों की इस मायने में प्रतिष्ठा रही है कि ये लोग अत्यंत प्रगतिशील, अध्ययन और अध्यापन से जुड़े लोग रहे हैं. महान भारतीय काव्यशास्त्रियों और सौंदर्यशास्त्रियों, शैवशास्त्रियों के वर्तमान उत्तराधिकारियों को यह अचानक क्या हो गया कि 1990 में धर्म के नाम पर कश्मीर घाटी से खदेड दिए जाने के बाद यह लोग आपके अनुसार भाजपा की सरपरस्ती में जीने लगे.
जो अमूमन कश्मीर में कभी संघ या भाजपा के प्रति आकर्षित न हुए, जिन्होंने कभी एक नगर निगम के पार्षद तक को नहीं चुना या श्रीनगर के हब्बाकदल विधान सभा क्षेत्र में भाजपा नेता टिकालाल टपिलू को कश्मीरी पंडितों ने 2200 से ज्यादा वोट नहीं दिया. जहाँ से वे अगर चाहते तो जिता सकते थे और उसी वकील टिकालाल टपिलू को पंडितों के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में जब आतंकवादियों ने गोलियों से भून डाला तो बीस हजार से ज्यादा कश्मीरी पंडित उसकी शवयात्रा में शामिल हुए. जिसमें श्रीनगर के भाजपाई, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, काँग्रेसी और नेशनल कान्फ्रैन्सी सभी राजनीतिक दलों के कश्मीरी पंडित सम्मिलित हुए.
उसके बाद एक के बाद एक कश्मीरी पंडितों को चुन चुनकर निर्बाध मारते चले जाने का खूनी खेल आरंभ हुआ जो तब तक नहीं रुका जब तक कि सभी कश्मीरी पंडितों को अपनी मातृभूमि से बे दखल न किया गया. धमकियाँ, अपहरण, बलात्कार का क्रम भी साथ साथ जारी रहा. तब का मुख्यमंत्री डॉ फारूख अब्दुल्ला फ्रांस के नीरो की तरह धधकते कश्मीर को अनाथ छोड़कर लंदन जाकर गोल्फ खेलता रहा.
आतंकवादियों ने कश्मीर के अखबार-ए-अलसफा, चट्टान में हिंदुओं को खली धमकियाँ देना शुरू किया। हमारी जलावतनी का बेसुरा राग- जगमोहन अलापने वालों को अखबार-ए-अलसफा के पहले पृष्ठ पर हेडलाइन के रूप में छपी यह धमकी पढनी चाहिए-
"कश्मीरी पंडितों 48 घंटों के अंदर अंदर कश्मीर घाटी छोड़ कर जाओ। वर्ना ...."
आपको उस समय का परिदृश्य याद दिलाने के लिए आए दिन शहरों, कस्बों, जिलों में सैकड़ों की तादाद में निकलने वाले भारी जुलूस निकले, जिनमें ये गगनचुंबी नारे गुँजाए जाते -
"ऐ काफिरो, ऐ जालिमो! कश्मीर हमारा छोड़ दो!"
"अगर कश्मीर में रहना होगा, अल्लाह हो अकबर कहना होगा!"
"हम क्या चाहते आजादी
आजादी का मतलब क्या
ला इल्लाह इल्लाह!
पाकिस्तान से रिश्ता क्या
ला इल्लाह इल्लाह!"
"भारत वालों जान लो
कश्मीर तुम्हारी मौत है!"
"कश्मीर बनेगा पाकिस्तान! "
"भटन हुंद ब्योल
खोदायन गोल! (खुदा कश्मीरी हिन्दुओं का बीज नासे)
"असि छु बनावुन पाकिस्तान
भटव रोसतुय भटन्यव सान्निध्य!"
(हम बनाएँगे पाकिस्तान
पंडितों बिना पंडितानियों सहित)
ऐसे माहौल में बसों, टैक्सियों, ट्रकों, ट्रालियों में, जिसे जो साधन मिला, अपने बाल बच्चे विशेषकर बहू बेटियाँ लेकर कश्मीरी पंडित ठठ के ठठ भाग आए जम्मू। अफसोस कि आप कह रहे हैं कि तबके राज्यपाल जगमोहन ने फौजी गाड़ियों मे जम्मू छोड़ा। कोई इतना झूठ कैसे कह सकता है!
कश्मीरी कहावत है कि जो नदी पार से गाली दे या मुँह पर झूठ कहे, दोनों को 'केशव कहा न जाई का कहिए' .....
जम्मू के लोगों ने अपने घरों के, मंदिरों के, गुरुद्वारों के, स्कूलों के, धर्मशालाओं के, तबेलों के, ढरबों के खिड़की दरवाजे खोले और दुखियारों को सर छिपाने की जगह मिल गयी. निकृष्ट कोटि का दुष्प्रचार यह किया गया कि राज्यपाल जगमोहन ने पंडितों को जम्मू दिल्ली आदि शहरों में महंगे फ्लैट और प्लॉट देने का प्रलोभन देकर कश्मीर से निकलने को प्रेरित किया, ताकि वह घाटी में मुसलमानों का सफाया कर सके और कश्मीरी पंडितों को कोई आँच न आए.
झूठ-झूठ ... कितने-कितने बेसिर पैर झूठ!
अब शरणार्थी कैंपों में अस्तित्व और अस्मिता का दैनंदिन संघर्ष करने को अभिशप्त गैर- संघी तथा गैर भाजपाई कश्मीरी पंडितों ने अपेक्षा की थी कि उनके कम्युनिस्ट दोस्त और नेता, समाजवादी या लोहियावादी, काँग्रेसी दलों के लोग और नेता उनकी खबर लेंगे. राहत के दो शब्द बोलेंगे. उनके आँसू पोंछेगे. कुछ मदद करेंगे. लेकिन कोई नहीं आया सामने.
तेजाबी धूप में मोटे रैग्जीन के 8×10 फीट के तंबुओं में पड़े शरणार्थी कश्मीरी पंडितों के लिए यह सबसे बड़ा त्रासद अनुभव था. कोई उनके बारे मुँह तक नहीं खोल रहा था. उन्हें एकदम महसूस हुआ कि वे अकेले हैं. कश्मीर का बड़े से बड़ा कम्युनिस्ट सड़कों पर था. वाम विचारक प्रोफेसर एच एल मिस्री, कम्युनिस्ट ओएन त्रिछ़ल, लोहियावादी राजनीतिशास्त्री डॉ एमके टेंग, चित्रकार लोक कौल, मध्य एशिया के अप्रतिम फारसी विद्वान डॉ काशीनाथ पंडिता, चित्रकार बंसी पारिमू, कहानीकार हरिकृष्ण कौल से लेकर डॉ रमेश तैमीरी और महाराज शाह आदि वामपंथी बुद्धिजीवी और रचनाकार बेबस होकर राहत प्रदान कर रही भाजपा नेताओं और कार्यालयों में चक्कर काटने को अभिशप्त थे.
भाजपाई सामने आए, चाहे उनके राजनीतिक निहितार्थ, वो सब राजनीतिक दलों के होते हैं. लेकिन आई सामने भाजपा. शरणार्थी कैंपों में तरस रहे, मर रहे कश्मीरी पंडितों को राहत दी, और दिलाई. वामपंथी चुप रहे. गायब रहे समाजवादी. कांग्रेसी. प्रगतिशील लेखक और पत्रकार. सेक्युलर कहलाने वाले उदारवादी. किसी ने मुँह न खोला.
एक कविता, एक कहानी, एक टिप्पणी, एक संयुक्त हस्ताक्षरित अपील, एक संपादकीय तक नहीं. पत्रिकाओं के विशेषांक तो दूर, उल्टे में ये तथाकथित सेक्युलर महान लोग हमारे विस्थापन के बारे में झूठ फैलाने में लग गये. विस्थापितों में भयंकर प्रतिक्रिया हुई, जो सहज थी. सामने भाजपा थी. राहत और बड़बोलेपन के साथ. समर्थन और सहानुभूति के साथ.
यही जवाब मैंने राजेंद्र यादव के ऐसे ही एक सवाल के जवाब में दिया था. उन्होंने हंस कार्यालय में पूछा था, यह सेक्युलर कश्मीरी भाजपा की झोली में कैसे गये? मैंने राजेंद्र यादव से कहा था कि इसके जिम्मेदार आप हैं, आप जैसे लोग हैं. वामपंथियों ने ऐसी कोई पहल की होती तो वे कभी न झुकते उनकी तरफ. राजेन्द्र यादव मेरी दलील सुनकर हामी में सर हिलाते रहे.
फिर ढाई साल के बाद घटी बाबरी मस्जिद ढहाने की घटना. फिर दंगे. फिर गोधरा की रिएक्शन में गुजरात दंगे. हत्याएँ. मारकाट. सारे वामपंथी, प्रगतिशील, सेक्युलर बुद्धिजीवी जाग गये. खूँखार हुई. कवियों ने कविताएँ रचीं. कहानियाँ लिखी गयीं. जुलूस निकले. जलसे हुए. पत्रिकाओं के विशेषांकों पर विशेषांक निकले. संयुक्त हस्ताक्षरित अपीलों पर अपीलें जारी हुईं. जिन कश्मीरी विस्थापितों की मुस्लिम आतंकवादियों और अलगवादियों के हाथों सामूहिक तबाही पर आप लोग आपराधिक खामोशी धारण किए रहे, उन कश्मीरी जलावतन साहित्यकारों ने भी अयोध्या और गुजरात के हिंसाचार का खुलकर विरोध किया. कविताएँ लिखीं. सहमत के प्रदर्शनों में शामिल रहे.
डॉ अपूर्वानंद के बुलाये सफदर हाशमी मार्ग पर विरोध प्रदर्शन में मैं अपने कई साहित्यकार और रंगकर्मी तथा कलाकार साथियों के साथ शामिल हुआ और तबके गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जारी निंदा प्रस्ताव पर मेरे भी हस्ताक्षर देखें.
लेकिन हमारे साथ कोई न रहा. आप न रहे. किसी ने एक कविता तक न लिखी. वैसे भी हत्याओं के दिनों में कविताएँ रच रचकर होता भी क्या है! समय के तेवर और संवेदनाएँ सच्चे इतिहास की तरह दर्ज रहती हैं.
जैसे आज जो चुनिंदा हत्याएँ हो रही हैं कलबुर्गी से पंसारी तक जिसकी मैंने जम्मू में प्रेस कान्फ्रैन्स बुलाकर घोर निन्दा की. वैसे ही जैसे मुम्बई में भी जावेद अख्तर को मोती कौल और अशोक पंडित को साथ बिठाकर प्रैस कान्फ्रैन्स की थी गुजरात दंगों और जीनोसाइडल हिंसा के खिलाफ. आपको शायद यह भी याद दिलाता चलूँ कि मैं कश्मीरी विस्थापित कैंपों से गुजरात के शाह आलम खान जैसे कैंपों में राहत लेकर भी गया था. क्या आप ऐसी कोई एक भी मिसाल दे सकते हैं, अपनी तरफ से?
एक भी कोई कविता 'गुजरात के एक मृतक का बयान' जैसी जो आपने किसी कश्मीरी पंडित मृतक या उनके विनाश पर लिखी हो? कभी आप जम्मू के किसी शरणार्थी कैंप में आए हों?आपको मैंने कश्मीरी विस्थापितों के पहले विश्व सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रण पत्र भेजा जो अकेले आपको नहीं, दर्जनों साहित्यकारों को भी दिया था. कोई नहीं आया. सिवाय निर्मल वर्मा और डॉ संजय चतुर्वेदी के. विश्वनाथ त्रिपाठी जी हमारी ओर से वाहन न भेज सकने के कारण दिलशाद गार्डन से खेलगाँव न आ सके.
इस तरह अकेले पड़े कश्मीरी विस्थापित और उनके लेखक और कवि. लेकिन हम लिखते रहे. हमने मृतकों का धर्म देखकर शोकगीत नहीं लिखे. अभी जुनैद(वल्लभगढ), अखलाख(दादरी), पहलू खान(अलवर), मोहम्मद मज़लूम और इनायतुल्ला (झारखंड) और पोहरू कुपवाड़ा कश्मीर में कश्मीरी पंडित सिपाही समीर भट्ट तथा फिर डीएसपी मुहम्मद अयूब पंडित(जामिया मस्जिद, श्रीनगर) की बेकाबू हिंस्र भीड़ द्वारा बर्बर हत्याओं के विरोध में मेरी निम्नलिखित कविता 'जघन्य है ऐसा समय' तो पढ़ी ही होगी.
Abha Khanna Dinesh Manhotra Pawan Sharma

रविवार, 14 अगस्त 2016

:: स्वतन्त्रता दिवस का चिंतन ::

स्वास्थ्य को लेकर सरकार की पहल सराहनीय हो गई है, जगह जगह एम्बुलेंस सजगता के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। पुलिस विभाग भी कुछ अर्से से सजग व चौकन्ना हो गया है। प्रधानमंत्री सड़कों ने क्रान्ति लादी है। स्कूल चलो अभियान सफलता के शिखर छू रहा है। इसके बावजूद भी अनेक समस्यायें रुकावट बनकर खड़ी हैं। लोकतन्त्र की आवाज धरने प्रदर्शन लगभग न के बराबर हैं। ऐसा तो नहीं हो रहा कि कहीं हम अपनी ही गुलामी की दिशा में आगे बढ़ रहे हों?

ठंड की रातों में रात में दो बजे स्टेशन पर पर कोई भूली बिसरी आवाज चाय गर्म. .... की तरह अब धरने और प्रदर्शन लगभग मन्द से हो गये हैं, ऐसे कानून बन गये हैं कि धरना देना अपराध सा हो गया है। धरना देना है तो किसी एक कोने में स्थान निश्चित है, जैसे दिल्ली में जन्तर मन्तर, भोपाल में जहांगीराबाद के पास।

धरना लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम होता है। सड़क तो रोक ही नहीं सकते। प्रदर्शन भी न के बराबर हैं। सरकार ताकतवर होती जा रही हैं!  जनता की ताकत घटती जा रही है। जनता की बनाई सरकार पर जनता का नियंत्रण घटता जा रहा है। ऐसे कभी नहीं होगा कि सरकार अपनी दम पर सदा आदर्श बनी रहे, घोड़े की लगाम की तरह सरकार पर चौकसी, जनता को सदैव सजग रहना होगा, चाबुक दिखाने के लिये भी हो और मारने के लिये भी।

सरकार बनीं रहेगी, संचालन करनेवाले दल बदलते रहेंगे।सभी नागरिक के नाते सोचें कि कहीं जाने अनजाने हम अपने ही बनाये जाल में तो नहीं उलझते जा रहें हैं? कुछ बातें स्मरणीय,  चिंतनीय हैं:-

राजनैतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति का काकस तो नहीं बन रहा है। जनता के साथ घुलमिल कर काम करनेवाले विपक्षी दल भी कमजोर तो नहीं हो रहे हैं। जनता के जागृत लोग अपनी संख्या में बढ़ रहे हैं कि नहीं, जीवित जागृत समाज लोकतंत्र का असली प्रहरी है।

माही-नर्मदा क्षेत्र (अपना क्षेत्र::आलीराजपुर+झाबुआ)

झाबुआ और आलीराजपुर दो जिलों की जनसंख्या अब बीस लाख के पार हो गई है।  इसमें 88% (17,60,000) लोग गरीब कर्जदार, अभावग्रस्त हैं। अर्थात ढाई लाख से अधिक परिवार। इन ढाई लाख परिवारों का दुख जानने का का कोई सिस्टम बनाया गया है क्या? वह सिस्टम कहीं फैल हो जाये तो उसे ठीक कैसे किया जायेगा, ठीक कौन करेगा? यह ज्वलंत प्रश्न है।

12% (24000) लोग अर्थात लगभग 35 हजार परिवार कर्जदार नहीं हैं, अभावग्रस्त भी नहीं हैं, समपन्न हैं, सम्पन्न परिवारों की भी समस्यायें हैं, इनकी समस्याओं के समाधान में सामाजिक संस्थायें, पत्र, पत्रकार, राजनैतिक दल, सरकारी तंत्र ही सक्रिय हैं। अभी में देख रहा हूँ कि गाँवों के साथ जिला केन्द्र पर बिजली कभी भी किसी भी समय चली जाती है। गाँव में क्या हाल हैं, वर्षाकाल में यह स्थिति है। जबकि इस समय बिजली की खपत बहुत कम है। बिजली विभाग सही काम करे, किसकी जवाबदारी है ?

कृषि प्रधान जिले में कृषि विभाग क्या कर रहा है? आलीराजपुर+झाबुआ जहाँ 14 लाख पशु रहते हैं, उन दोनों जिलों में पशुचिकित्सालय हैं भी कि नहीं यह देखना किसका काम हैं? पशु चिकित्सा में ये दोनों जिले अत्यधिक पिछड़े हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जिन्दा है या मर गया है किससे पूछें? साढ़े तीन लाख विद्यार्थी जिस जगह पढ़ते हों उन दोनों जिलों के शिक्षक किस हालत में हैं उनका सुख दुख जानने के लिये क्या करें? उनका शैक्षणिक प्रशिक्षण सही चलता है कि नहीं, कौन जिम्मेदार है?

इण्टरनेट सेटेलाइट से जहाँ तालाबों की प्रचुर संख्या का पता चल जाता हो वहाँ स्टाप डैम में सही समय पर रिपेयर होकर गेट लग जायें , कौन सा विभाग इसके लिये जिम्मेदारी वहन कर रहा है? कहीं सरकारी विभाग आपसी खींचतान में तो नहीं उलझ गये?  पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की वर्तमान स्थिति क्या है?  क्या जनपद और जिला परिषद अपना काम सही ढंग से कर पा रहीं हैं? सांसद, विधायक लोकप्रतिनिधि के रूप में काम कर पा रहे हैं? जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी ताकत कहाँ लग रही है?

देश का प्रधानमंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी अपनी सरकारी मशीनरी को स्मूथ चलाने के लिये अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को क्या सक्षम बना चुके हैं या सक्षम बना रहें हैं ? विपक्षी दल ठीक से काम करे, इसकी फिकर में कौन है?  लोकतंत्र में जनता सजगता दिखाये तो इस सजगता को समझने के लिये सत्तापक्ष की तरफ से कौन नियुक्त है?

स्वतन्त्रता दिवस एक दिन के लिये मनाना ठीक है पर जरूरत है इसे एक मास तक आत्मविश्लेषण के रूप में मनाने की। सरकारी तंत्र , सामाजिक संस्थायें, सांस्कृतिक संगठन, राजनैतिक दल, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्र-पत्रकार मिलकर साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आत्मविश्लेषण द्वारा इस तरह के प्रयास करें जिससे लोकतंत्र अपनी कसौटी पर सही रहे व हमेशा खरा उतरे।

70 वें स्वतन्त्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना?

शनिवार, 16 जुलाई 2016

भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, रुड़की

भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, रुड़की के बीस छात्र शैक्षणिक भ्रमण पर झाबुआ में कल 16/07/2016 प्रात: 9-30 पर शिवगंगा आश्रम मेघनगर में पहँचे । अपराह्न 11-30 बजे चार समूहों में चार दिशाओं अलग अलग गाँव में जाने के केलिये निकले। एक समूह थाँदला,  एक मेघनगर,  एक झाबुआ,  एक राणापुर तहसील में पहुँचा।
 राणापुर। के समूह के साथ कुछ समय में भी रहा। गाँवों में तकनीकि का का स्वरूप कैसा है? यह प्रश्न समूह के सभी पाँचों छात्रों के मन में था।




हम गुलाबपुरा में गाँव में जाकर रहे थे तभी एक किसान खेती में दवाई का छिड़ काव्य करता दिख गया। किसान की पत्नी के हाथ में एक फ्रेम पर सीमेंट की बोरी को उधेड़ कर निकाला गया कपड़ा फ्रेम पर सिलाई करके कसा हुआ था।
मूमफली और ज्वार की मिश्रित खेती
हम सभी उससे यह जानने पहुँचे कि तुम्हारी पत्नि इस पर्दे से क्या कर रहीं हैं?

युवा किसान ने बताया कि इस दवा से ज्वार मर जाती है, मूमफली का दवा का कोई असर नहीं होता। खेत में चारा बहुत हो गया है, चारे को मारने की दवा है।
ज्वार के ऊपर दवा न गिरे, इसलिये हमने यह कपड़े को लकड़ी की फ्रेम पर कसे दिया है, इससे यह दवा ज्वार के पौधों पर नहीं गिर पाती।

गाँव में सरलता से बननेवाले यह टैक्नोलॉजी का उदाहरण है।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

शिवगंगा का प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट

जैसे-जैसे ताकत बढ़ती है और अपनी कल्पना को साकार स्वरूप देने की क्षमता बढ़ती है, साधन उपलब्ध होने लगते हैं तो योजनाओं बनने लगती हैं। प्लानिंग होती है। कल का वह गरीब आदमी कुछ करता नजर आता है। मानो वह सोचता हो कि उसका घर होगा। उसके कमरे कितने होंगे, आर्किटेक्ट कौन होगा आदि प्रश्न उसके मन में आने लगते हैं। जैसे जैसे हैसियत बढ़ती है यह सब होता ही है।

 उदाहरण के लिये यदि चित्रकार है तो उसके चित्र के रंग उभरने लगते हैं। चित्र की कल्पना नयी नहीं होती। चित्र वही है परन्तु क्या वह सब रंग एक साथ भरता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। पहले वह आउटलाइन खींचता है। क्या कोई ऐसा कहेगा कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ नहीं है, सो बात नहीं। धीरे-धीरे कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट कहा गया है, बैसा होता है।

सबेरे चार बजे हम अपनी खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो सामने का वृक्ष का अंधेरे में दिखाई देता है;  परन्तु साफ नहीं। धीरे-धीरे प्रकाश फैलता। वृक्ष स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वृक्ष वही है। कोई ऐसा नहीं कहा सकता कि नया वृक्ष उग आया। पहले जो नहीं था बैसा एकाएक हो गया, सो बात नहीं। पेड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । बस प्रकाश अधिक होने से  डाली, पत्ते, फूल सभी कुछ दिखाई देने लगे हैं। अनफोल्डमेंट का मतलब यही है, कि चीज वही है फिर भी उसका दर्शन क्रमश: होने लगा।

इसी प्रकार ध्येय साकार होता है। कुछ सिद्धान्तों पर आधारित ध्येय लेकर हम प्रारंभ करते हैं। जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है यह प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट होता है। यह आवश्यक भी है । बिना शक्ति के जिस कल्पना को पागलपन करार दिया जाता है वही अब बुद्धिमानी मानी जाती है । इसलिये क्षमता बढ़ने के साथ साथ कल्पना साकार होना ठीक है ।
---------------------------------------------------------------------------------------
उक्त विचार दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के हैं

गुरुवार, 23 जून 2016

विजन इण्डिया फाउण्डेविज 20 दिवसीय कार्यशाला जून 2016


18 जून 2016 को हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन के 20 दिवसीय कार्यशाला में एक दिन सम्मलित हुये। शिवगंगा झाबुआ की ओर से हम वहाँ सामाजिक सहभागिता के अनुभवों के आदान प्रदान के लिये पहुँचे। हमारे लिये दिल्ली पहुँचने तक यह भी मालूम नहीं था कि कार्यक्रम के आयोजन कर्ता कौन हैं ? चिन्मय जैन ने अप्रैल में मुझे बताया था कि एक कैंप आईआईटी दिल्ली कि लड़कों का है, जिसमें आपको उसमें पब्लिक पार्टीशिपेशन विषय रखना है। कार्यक्रम जून में था इसलिए मैंने हाँ कह दिया। चिन्मय झाबुआ आते जाते रहते हैं इसलिये मैं निश्चिंत था पर मैंने उनसे कहा कि हम झाबुआ से एक नहीं, चार व्यक्ति वहाँ जाना चाहेंगे, चिन्मय ने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों से बात करके हम चार व्यक्तियों को उसमें (विजन इण्डिया फाउण्डेशन) के कार्यक्रम में सहभागी बनने की सहमति दे दी ।

17 जून अर्थात ट्रैन में ही हमको पता चला कि कैंप स्थल सोनीपत में है और हमें नई दिल्ली के स्थान पर न उतरकर पानीपत में ट्रेन से उतरना चाहिए। चिन्मय जी ने हमें अजेय का मोबाइल नम्बर दिया। हमने अजेय से बात की, अजेय ने हमें पानीपत रेलवे स्टशन पर रिसीव करने की बात कही। सुबह जब हम पानीपत स्टेशन पर पहुँचे तो अजेय वहाँ पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रात: 6 बजे थे, वहाँ से एक घंटे का सफर और शेष था हम 7 बजे "जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी" के भव्य एवं अत्यधिक आधुनिक कैंपस में पहुँच गये।  
इस कैंपस में 200 फुट ऊँचे खंबे पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हवा पूर्ण तेजस्विता के साथ लहरा रहा था। यूनिवर्सिटी कैंपस की भव्यता बता रही थी कि आधुनिक भारत के शिक्षा केन्द्र में आपका तहे दिल से स्वागत है। पानीपत से सोनीपत की एक घंटे की यात्रा में हमने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के विषय में जानकारी प्राप्त की। हम जैसे जैसे अजेय जी से बात करते जा रहे थे,  अजेय हमें बता रहे थे कि कैसे विजन इण्डिया फाउण्डेशन का निर्माण हुआ ।

अजेय ने कहा कि भारत के युवा देश के लिये बहुत कुछ करना चाहते हैं पर उन्हें ऐसा माहौल नहीं मिलता। विजन इण्डिया फाउण्डेशन युवाओं को ऐसा वातावरण देना चाहता है, जिसमें उन्हें काम करने में आनन्द आये,  वह उत्साह से भरे रहें, युवाओं को भविष्य की चुनौतियाँ क्या हैं ? वे चुनौतियों को स्वीकार करें और उनको समझ कर उन चुनौतियों से निपटने का सशक्त रास्ता बनायें।

अजेय के बोलने में उनका आत्मविश्वास स्पष्ट झलक रहा था। उनकी वाॅडी लैंग्वेज कह रही थी कि महेश जी दुनिया के आने वाले स्वर्णिम भविष्य का निर्माण भारत के युवा बनायेंगे, आप निश्चिंत रहें। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को आश्वस्त कर रही थी। हमारी जिज्ञसायें थीं जिन्हें हमने बातचीत के जरिये, शान्त किया। हम जानना चाहते थे कि यहाँ 140 विद्यार्थी कहाँ कहाँ से आये हैं ? अजेय ने बताया कि ये सभी स्टूडेंट्स भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से यहाँ विद्यार्थी बनकर आये हैं। बेंगलूर की लाॅ यूनिवर्सिटी से कुछ छात्र थे तो कुछ जेएनयू से। आईआईटी दिल्ली,  मुम्बई रुड़की,  कानपुर बहुत से महाविद्यालय जिनके हमें अब नाम भी याद नहीं रहे।

हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन में स्पीकर थे अत: हमारी सहायता व सेवा के लिये जिस विद्यार्थी की ड्यूटी लगाई
उनका नाम था अनिल। अनिल उन 30 प्रबन्धकों में से एक थे जो इस bootcamp की सफलता के सूत्रधार थे। कुछ ही समय के अन्दर उनकी कार्यकुशलता को देखकर, हमें यह लगने लगा छोटे छोटे दिखने वाले ये लड़के बहुत बड़े काम करने में  सक्षम सक्षम रहे हैं, हमें भी इनका सहयोग करना चाहिए, हमारे सहायक बनाये गये अनिल के चेहरे का तेज बताता था कि वह कुछ बड़ा करने का आत्मविश्वास प्राप्त कर चुका है। अनिल भारत के किस प्रान्त से हैं यह मैं भूल गया।

हमारे मन में यह प्रश्न बार बार उठता कि विजन इण्डिया फाउण्डेशन की स्थापना किसने की ? पर होता यह कि जिस 'व्यवस्थापक' विद्यार्थी से बात करो वही हमें विजन इण्डिया फाउण्डेशन का संस्थापक लगने लगता था, हमने भी सोचा जो भी संस्थापक हो बाद में पता कर लेंगे, काम तो सब कुछ अच्छा। bootcamp में 140 छात्र प्रतिभागी थे और उनकी व्यवस्था में 30 छात्र। यह सब यहाँ क्यों आये? इन्हें क्या करना है? इन सभी बातों के  उत्तर हमें मिल गये थे फिर भी इन सभी का सामूहिक उद्देश्य था कि अपने देश को विश्व की महाशक्ति बनाना है, इस काम के लिये जो जो काम करना जरूरी है वह करेंगें, जिस प्रकार की शिक्षा चाहिये वह लेंगे, सीखेंगे। उन विद्यार्थियों के शब्द कम उनकी आँखों की चमक बताती थी की ये कुछ करके ही दम लेंगे।

शिवजी के हलमा की लघु फिल्म दिखाकर हमने अपने विषय को तीन भागों में में पूर्ण किया। पहले भाग में मे राजाराम कटारा जी और भवरसिंह भयड़िया जी ने शिवगंगा झाबुआ के कार्य कार्यक्रम व उनके उद्देश्य, दृश्य एवं श्रव्य माध्यम से  से 25 मिनट में बताये, मैंने तो मेरे अनुभव सुनाये-मुझे झाबुआ के विषय में 1998 में जो बताया गया था अर्थात झाबुआ की इमेज, और कुछ समय बाद वास्तव में मुझे झाबुआ दिखा, झाबुआ की इमेज अच्छी नहीं है पर झाबुआ बहुत अच्छा है। झाबुआ को उपदेश देकर नहीं समझ सकते। वहाँ से सीखने के लिये भी बहुत ज्ञान की बातें हैं। करने के लिये भी बहुत काम हैं।

वहाँ का मंच न केवल आकर्षक था अपितु श्रोता और वक्ता की बीच एक  शक्तिशाली माध्यम बनाता था।
कठिन से कठिन विषयों की जुगाली(विचार विमर्श ) करने के लिये लिये एक और अन्य स्थान था  जिसका नाम था "अड्डा" अड्डा में बैठकर छात्र घंटों तक डिस्कस करते। हमारा विषय समाप्त हुआ, हम चाय पान के पश्चात जब हम अड्डे पर पहुँचे तो प्रश्न उत्तर शुरू हो गये, बातों ही बातों में हमें पता ही ना चला कि कब साम के छ: बज गये। डेड़ घंटे का समय सार्थक विचार विमर्श में समाप्त हो गया। समय तो हमेशा ही कम पड़त है पर 18 जून के उस डेड़ घंटे में हमारी झोली नये ज्ञान से लबालब भरी थी
सदा प्रसन्न रहनेवाले ये छात्र विजन इण्डिया फाउण्डेशन के कार्यक्रम में आये भारत का लघुकथा रूप थे। वे आपस में इतने घुल मिल गये थे कि उनमें कौन कब से , कहाँ से दोस्त बना, जानना मुश्किल था। वे अधिकांश लँगोटिया यार (बचपन के दोस्त) लग रहे थे। उन प्रतिभागी छात्रों में परस्पर 'वर्किंग टू गैदर इज सक्सेस' का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हो रहा था।
  170 विजनरी नवयुवक इसमें बन रहे थे। लिविंग टू गैर इज प्रोग्रेस के सूत्र के अनुसार बना रहे थे। साथ रहकर सीख रहे थे।
युवाओं  की ऐसी मस्ती तो बहुत जगह दिख सकती है पर इस यंग इण्डिया में एक साथ एकट्ठे होने में ' हम मस्तों में आने मिले कोई हिम्मत वाला रे' का आह्वान स्पष्ट दिख रहा था। उन छात्रों के बीच विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों ने ऐसा कुछ वातावरण तैयार किया था जिससे वह चाहे जैसे फिल्मी गाने गाते हों पर उसकी ध्वनि "यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में , मस्ती है झूमे ...... के भाव सभी के मन में थे।

कुल मिलाकर विजन इण्डिया फाउण्डेशन ने हमें उस समय चौंका दिया कि जब। में पता चला इसके आयोजक आईआईटी रुड़की और दिल्ली,  मुंबई के कुछ याने सात यंग शिक्षक हैं, ठीक कहा 7 शिक्षक। चाणक्य सीरियल के शिक्षक, न कि किसी आईआईटी कालेज के फैकल्टी मैंम्बर । धन की सरकारी सहायता के बिना उससे आर्थिक सहायता की अपेक्षा किये बिना, यह नये स्वर्णिम भारत के निर्माण में लगे हैं।

जब हमने पूछा कि इतने अधिक बजट की यह 20 दिवसीय कार्यशाला बिना धन के कैसे चल रही है? हमारे साथी मित्र अनिल ने बताया कि यहाँ आया प्रत्येक विद्यार्थी 30 हजार रुपये शुल्क देकर आया है। प्रत्येक वप्रत्ये30000/= रुपये 20 दिन की शिक्षा?  हमें आश्चर्य तो हो रहा है पर सत्य को झुठलाया भी नहीं जा सकता।

धन्यवाद विजन इण्डिया फाउण्डेशन एवं उनकी टीम, नोमेश शोभित मोहित अजेय पराग आनन्द चिन्मय। 
सभी टीम सदस्य ! और कुछ हो न हो पर आपके माता पिताओं ने आप लोगों के नाम सोच समझ के ही रखे हैं , आपके काम को देख कर तो यही लगता रहा है ।
महेश शर्मा 'शिवगंगा गुरुकुल धरमपुरी झाबुआ' मध्यप्रदेश ।।