शनिवार, 14 मई 2016

उज्जैन में प्रधानमंत्री का उद्बोधन, सिंहस्थ के पराप्रेक्ष्य में

उज्जैन, 14 मई: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उज्जैन सिंघस्थ कुम्भ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए मीडिया पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि हमारे मीडिया को शॉर्टकट मारने की आदत है इसलिए वह चुन चुन कर चीजों को दिखाता है। मोदी ने कहा कि लोग हमें कहते हैं कि हम तो बहुत ही अनऑर्गनाइज्ड और बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले लोग हैं, वास्तविकता यह है कि हमें हमारी बातों को सही तरीके से रखनी आती ही नही है और जिनको रखने की जिम्मेदारी है, जिन्होंने इस प्रकार के प्रोफेशन को स्वीकार किया है वे भी अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से नहीं निभाते हैं।
उन्होंने इशारों इशारों में कहा कि मीडिया ने इस कुंभ मेले की एक ही पहचान बना दी गई है – नागा साधु, यह सब इसलिए हुआ है, क्योंकि ब्रांडिंग ठीक तरह से नहीं की गई। उनकी तस्वीर निकालना, उसी को प्रचारित करना और कुंभ को इसी के आसपास सीमित कर दिया गया है।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “क्या हम दुनिया के लोगों से कह सकते हैं कि हमारी इतनी बड़ी ऑर्गनाइजिंग कैपिसिटी है? क्या यह बता सकते हैं कि इस आयोजन के लिए किसी को निमंत्रणपत्र गया था, सर्कुलर जारी किया गया था जो इतनी बड़ी संख्या में लोग क्षिप्रा के तट पर आ गए। यह मैनेजमेंट की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है।”
मोदी ने कहा, “यहां तीस दिन तक इतनी संख्या में हर रोज लोग आते हैं, जितनी जनसंख्या यूरोप के एक देश की है। मगर हम भारत की ब्रांडिंग का परिचय नहीं दे पा रहे हैं।”
उन्होंने भारत में होने वाले चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि यह दुनिया के लिए अजूबा है। इतना बड़ा देश, दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर, और हमारा चुनाव आयोग आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए चुनाव कराता है। यह प्रबंधन के क्षेत्र में दुनिया के लिए सबसे बड़ी ‘केस स्टडी’ है।
मोदी ने कहा, “हमें भारत को वैश्विक रूप में प्रदर्शित करने के लिए विश्व जिस भाषा को समझता है, जिस तर्क को समझता है, उसी भाषा में समझाने की जरूरत है और इसके लिए हमें चिंतन-मनन करना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है।
प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं अपने तरह से जब सोचता हूं तो लगता है, इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के द्वारा होता था। तर्क और अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि समाज की चिंता करने वाले मनीषी 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ के मौके पर इकट्ठा होते थे, विचार-विमर्श करते थे और बीते वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे। इसके साथ ही समाज के लिए अगले 12 वर्षो की दिशा क्या होगी, इसे तय करते थे।”
उन्होंने आगे कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत महात्मा तय एजेंडे पर काम करने लगते थे। इतना ही नहीं, तीन वर्ष उज्जैन, नासिक और इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे इकट्ठा होते थे, तब उनके बीच इस बात पर विमर्श होता था कि प्रयाग में जो तय हुआ था, उस दिशा में क्या हुआ। फिर उसके बाद आगामी तीन वर्ष का एजेंडा तय होता था।
मोदी ने कहा कि यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी, मगर धीरे-धीरे इसका रूप बदला। अनुभव यह है कि परंपरा तो रह जाती है, मगर प्राण खो जाते हैं। कुंभ के साथ भी यही हुआ, अब कुंभ सिर्फ डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक सीमीत रह गया है।
उन्होंने कहा कि संतों के आशीर्वाद से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ। यह प्रयास सदियों पुरानी परंपरा का आधुनिक संस्करण है। इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है। इस मंथन से जो 51 अमृतबिंदु निकले हैं, समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं।
प्रधानमंत्री ने विचार कुंभ के समापन मौके पर मौजूद साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुख से आह्वान किया कि मंथन से जो 51 अमृतबिंदु निकले हैं, उन पर सभी परंपराओं के अंदर रहकर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार जरूर करें।
उन्होंने कहा कि मोक्ष की बातें तो करें, मगर एक सप्ताह ऐसा हो जिसमें धरती की सच्चाई पर चर्चा हो, उसमें यह बताया जाए कि पेड़ क्यों लगाना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, धरती को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, नारी का सम्मान क्यों करना चाहिए।
इससे पहले, प्रधानमंत्री मोदी विशेष विमान से इंदौर पहुंचे, हवाईअड्डे पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य लोगों ने उनकी अगवानी की। मोदी यहां से श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना के साथ उज्जैन के निनोरा के लिए रवाना हुए।
निनोरा में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने की। मंच पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के अलावा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत और मेजबान मुख्यमंत्री शिवराज भी उपस्थित रहे।

शुक्रवार, 13 मई 2016

आजादी के बाद झाबुआ के भीलों की स्थिति

आजादी के बाद झाबुआ के भीलों की स्थिति

भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भील है। भारतीय जनगणना में भील, भिलाला, पटलिया का मतलब भी भील ही है। आदिवासी शब्द का मतलब भी झाबुआ में भील, भिलाला पटलिया से ही है। जनजाति का भी वही अर्थ है।

1860 के आसपास अँग्रेजों ने भीलों से दो महत्तवपूर्ण शक्तियाँ छीन लीं। भीलों के पास वनों का के स्वामित्त्व का अधिकार था इसलिये उन्हें वनवासी कहते थे, वनों पर भीलों का अधिकर खतम करने के लिये भीलों को वनवासी की जगह अमरीका का शब्द आदिवासी स्थापित करके एक साथ दो काम अँग्जों ने कर।लिये। जब भील अपने आपको वनवासी कहते थे तब तक उनका वनों पर नैसर्गिक अधिकार था, इसी शब्द के चलते अँग्रेज भीलों से वन के अधिकार छीन नहीं पा रहे थे। जैसे ही आदिवासी शब्द स्वीकृत हुआ अँग्रेजों ने  वनों के अधिकार अपने हाथ में ले लिये। आदिवासी शब्द आते ही वन शब्द चला गया। भीलों की वनों के नैसर्गिक अधिकार की लड़ाई खतम हो गई। वनों का स्वामित्त्व जो भीलों के पास था वह उनसे हट गया और अँग्रेजों हाथ में आ गया। ईसाइयों की भक्ति भी अँग्रेजों में थी इसलिये उन्हों भी वनवासी का अर्थ ज॔गली मानव बताना शुरू कर दिया, आदिवासी को तबज्जो देना शुरू कर दिया। भीलों में लीडरशिप की कमी का फायदा दोनों(ईसाई+अँग्रेज) ने उठाया। आदिवासी शबद आते ही भीलों के वन पर नैसर्गिक अधिकार का प्रमाण चला गया। वनवासी शब्द और वन पर अधिकार दोनों शक्तियाँ भीलों के हाथ से छिन गईं।

ध्यान रखनेवाली बात यह है कि उस समय तक आरएसएस की स्थापना नहीं हुई थी। यह बात कहना इसलिये उल्लेखनीय है कि आज कुछ होग जो अपने आप को भीलों का लीडर समझते हैं वे तर्क देते हैं कि वनवासी शब्द आरएसएस की देन है, पूर्णत: गलत है व अँग्रेजों की चाल है।  जो लोग अपने आपको वनवासी कहने में शरमाते हैं उन्हें वनाधिकार प्राप्त करने का कोई हक ही नहीं बचा। अँग्रेजों के आदिवासी तो गिरि कंदराओं में रहनेवाले असभ्य आदिमानवों की संतान हैं।

1860 के लगभग वनवासी भीलों से एक प्रकार से उनका सर्वस्व ही छिन गया। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि वनों के स्वामियों के हाथ से ही वनों का कटवाना चालू हो गया। भीलों के सामने ही उनका घर उजाड़ व वीरान हो गया? शोषण की इन्तिहा तब हो गई जब भीलों को जंगली जानबरों का शिकार करना  भी अवैध घोषित कर दिया। सही कहा जाय तो भील पर अँग्रेजों का असली प्रभावपूर्ण शासन वनाधिकार छीन लेने े बाद ही शुरू हुआ।
एक प्रकार से वनवासियों से बड़ी चतुराई पूर्वक उनसे उनका भोजन और भूमि छीन ली गई। अँग्रेजों की इस महालूट के बाद भीलों को पुलिस की यातनाओं का दौर शुरू हुआ। जागीरदार अँग्रेज ईसाई इन तीनों की मिलीभगत से भीलों को चोर लुटेरा, असभ्य, जंगली आदि विविध तमगे दिये गये। फिर इन्हीं शोषक समाज ने इन  भीलों को सुधारने का, इनको सुशिक्षित करने के नाम पर इनको इतना बदनाम कर दिया कि भील समाज अपना परिचय देने में भी झिझकने लगा।

समाज सुधारकों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिये यह बताना जरूरी हो गया कि वह भीलों को अधिक से अधिक असभ्य व पिछड़ा बतायें। शोषण का चक्र यहीं पर नहीं रुका आजादी के बाद जो प्रशासन आया वह कानवैंट शिक्षित था, उसने वनवासी तथा भील कहलाना ही बन्द नहीं कराया अपितु भीलों से उनकी एक एक पहचान को उनके असभ्य होने की निशानी बताया जैसे भीली बोली, तीर कामान, पगड़ी, केहड़ (अधोवस्त्र) आदि इन एक एक स्वाभिमान के चिन्ह छीन लिये या बलात् हटवा दिये। अब अपनी जड़ों से कटा आत्मग्लानी से भरा भील अपने समाज की उच्च परम्पराओं के होते हुये भी निरीह , उदास तथा एकांगी ,निराश, हतास दिखाई देता है।

तब का श्रेष्ठ भील समाज आज का दीन हीन आदिवासी के संबोधनों से विभूषित छिपता छिपाता जैेसे तैसे अपनी जिन्दगी जी रहा है। वह सोचता है कि ऐसी क्या प्रक्रिया अपनाऊँ जिससे आज की दुर्निवार्णीय समस्या से निजात पाई जा सके।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

महावीर जयन्ती:ओशो


अगर मैं महावीर को प्रेम करता हूं तो वे मुझे कपड़े पहने मिल जाएं तो भी मैं प्रेम करूंगा और वे नंगे मिल जाएं तो भी प्रेम करूंगा। लेकिन एक अनुयायी है, वह कहता है कि महावीर नग्न हैं, तो ही मैं प्रेम करूंगा! अगर वे नग्न नहीं हैं तो अज्ञानी हैं!
एक घटना घटी, मेरी एक मित्र, एक महिला हालैंड गई थी। वहां कृष्णमूर्ति का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन था, कोई छह-सात हजार लोग सारी दुनिया से इकट्ठे थे कृष्णमूर्ति को सुनने। वह मेरी परिचित महिला एक दुकान पर सांझ को गई है, उसके साथ दो और यूरोपियन महिलाएं थीं। वे तीनों एक छोटी सी दुकान पर कुछ खरीदने गई हैं।
वहां देख कर वे हैरान रह गई हैं, क्योंकि कृष्णमूर्ति वहां टाई खरीद रहे हैं! और न केवल टाई–एक तो यही बात बड़ी गलत मालूम पड़ी कि कृष्णमूर्ति जैसा ज्ञानी एक साधारण दुकान पर टाई खरीदता हो! तो ज्ञानी तो खतम ही हो गया उसी क्षण। और फिर न केवल टाई खरीद रहे हैं, बल्कि यह टाई लगा कर देखते हैं, वह टाई लगा कर देखते हैं; यह भी पसंद नहीं पड़ती, वह भी पसंद नहीं पड़ती! सारी दुकान की टाई फैला रखी हैं।
तो वे तीनों महिलाओं के मन में बड़ा संदेह भर गया कि हम किस व्यक्ति को सुनने इतनी दूर से आए हैं! और वह व्यक्ति एक साधारण सी दुकान पर टाई खरीद रहा है! और वह भी टाई में भी रंग मिला रहा है कि कौन सा मेल खाता है, कौन सा नहीं मेल खाता है!
उन दो यूरोपियन महिलाओं ने मेरी उस मित्र को कहा कि हम तो अब सुनने नहीं आएंगे। बात खतम हो गई है। एक साधारण आदमी को सुनने हम इतने दूर से व्यर्थ परेशान हुए। जिसको अभी कपड़ों का भी खयाल है इतना ज्यादा, उसको क्या ज्ञान मिला होगा! वे दोनों महिलाएं सम्मेलन में सम्मिलित हुए बिना वापस लौट गईं।
उस मेरी मित्र ने कृष्णमूर्ति को जाकर कहा कि आपको पता नहीं है कि आपके टाई खरीदने से कितना नुकसान हुआ! दो महिलाएं सम्मेलन छोड़ कर चली गई हैं, क्योंकि वे यह नहीं मान सकतीं कि एक ज्ञानी व्यक्ति और टाई खरीदता हो। तो कृष्णमूर्ति ने कहा कि चलो, दो का मुझसे छुटकारा हुआ, यह भी क्या कम है! दो मुझसे मुक्त हो गईं, यह भी क्या कम है! दो का भ्रम टूटा, यह भी क्या कम है! कृष्णमूर्ति ने कहा, क्या मैं टाई न खरीदूं तो ज्ञानी हो जाऊंगा? अगर ज्ञानी होने की इतनी सस्ती शर्त है तो कोई भी नासमझ इसे पूरी कर सकता है। अगर इतनी सस्ती शर्त से कोई ज्ञानी हो जाता है तो कोई भी नासमझ इसे पूरी कर सकता है। लेकिन इतनी सस्ती शर्त पर मैं ज्ञानी नहीं होना चाहता। और इतनी सस्ती शर्त पर जो मुझे ज्ञानी मानने को तैयार हैं, वे न मानें, यही अच्छा है, यही शुभ है।
लेकिन हम सबकी ऐसी शर्तें होती हैं। और शर्तें इसीलिए होती हैं कि हमारा कोई प्रेम नहीं है। हमारी अपनी धारणाएं हैं, उन धारणाओं पर हम कसने की कोशिश करते हैं एक आदमी को! और ध्यान रहे, जितना अदभुत व्यक्ति होगा, उतनी ही सारी धारणाओं को तोड़ देता है; किसी धारणा पर कसा नहीं जा सकता। असल में अदभुत व्यक्ति का अर्थ ही यह है कि पुरानी कसौटियां उस पर काम नहीं करतीं। अदभुत व्यक्ति, प्रतिभाशाली व्यक्ति न केवल खुद को निर्मित करता है बल्कि खुद को मापे जाने की कसौटियां भी फिर से निर्मित करता है।
और इसीलिए ऐसा हो जाता है कि महावीर जब पैदा होते हैं तो पुराने महापुरुषों के अनुयायी महावीर को नहीं पहचान पाते। क्योंकि उनकी कसौटियां जो रहती हैं, वे महावीर पर लागू नहीं पड़तीं। पुराना जो अनुयायी है, पुराने महापुरुषों का; वह पुरानी उन महापुरुषों के हिसाब से उसने धारणाएं बना कर रखी हैं, वह महावीर पर कसने की कोशिश करता है! महावीर उस पर नहीं उतर पाते, इसलिए व्यर्थ हो जाते हैं। लेकिन महावीर का अनुयायी वही बातें बुद्ध पर कसने की कोशिश करता है, और तब फिर मुश्किल हो जाती है।
हमारा चित्त अगर पूर्वाग्रह से भरा है तो महापुरुष तो दूर, एक छोटे से व्यक्ति को भी हम प्रेम करने में समर्थ नहीं हो पाते। एक पत्नी पति को प्रेम नहीं कर पाती, क्योंकि पति कैसा होना चाहिए, इसकी धारणा पक्की मजबूत है! एक पति पत्नी को प्रेम नहीं कर पाता, क्योंकि पत्नी कैसी होनी चाहिए, शास्त्रों से सब उसने सीख कर तैयार कर लिया है, वही अपेक्षा कर रहा है! वह इस व्यक्ति को जो सामने पत्नी या पति की तरह मौजूद है, देख ही नहीं रहा है। और ऐसा व्यक्ति कभी हुआ ही नहीं है। यह बिलकुल नया व्यक्ति है।
मैंने जो बातें महावीर के संबंध में कहीं, उन पर मेरा कोई पूर्व आग्रह नहीं है। कोई सूचनाओं के, किन्हीं धारणाओं के, किन्हीं मापदंडों के आधार पर मैंने उन्हें नहीं कसा है। मेरे प्रेम में वे जैसे दिखाई पड़ते हैं, वैसी मैंने बात की है। और जरूरी नहीं है कि मेरे प्रेम में वे जैसे दिखाई पड़ते हैं वैसे आपके प्रेम में भी दिखाई पड़ने चाहिए। अगर वैसा भी मैं आग्रह करूं, तो फिर मैं आपसे धारणाओं की अपेक्षा कर रहा हूं। मैंने अपनी बात कही, जैसा वे मुझे दिखाई पड़ते हैं, जैसा मैं उन्हें देख पाता हूं।
और इसलिए एक बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी होगी–यह बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी होगी कि महावीर के संबंध में जो भी मैंने कहा है, वह मैंने कहा है और मैं उसमें अनिवार्यरूप से उतना ही मौजूद हूं, जितने महावीर मौजूद हैं। वह मेरे और महावीर के बीच हुआ लेन-देन है। उसमें अकेले महावीर नहीं हैं, उसमें अकेला मैं भी नहीं हूं, उसमें हम दोनों हैं। और इसलिए यह बिलकुल ही असंभव है कि जो मैंने कहा है, ठीक बिलकुल वैसा ही किसी दूसरे को भी दिखाई पड़े। यह बिलकुल असंभव है। मैं किसी आब्जेक्टिव महावीर की, किसी दूर वस्तु की तरह खड़े हुए व्यक्ति की बात नहीं कर रहा हूं। मैं तो उस महावीर की बात कर रहा हूं, जिसमें मैं भी सम्मिलित हो गया हूं, जो मेरे लिए एक सब्जेक्टिव अनुभव है, एक आत्मगत अनुभूति बन गया है। इसलिए बहुत सी कठिनाइयां होंगी।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

गाँव की समृद्धि का मार्ग

कल चैत्र शुक्लनवमीं, १४/०४/२०१६ दशरथ के घर अयोध्या में राम का जन्म दिन था। राम के जीवन के अनेकों प्रेरक प्रसंग हैं। एक से अधिक विवाह व्यक्ति के जीवन में ईर्ष्या, वैमनस्य को जन्म देते हैं। राम के जीवन में भी ऐसा ही हुआ।


उन्हें वनवास हुआ। राम ने बिना आनाकानी किये कैकेयी के प्रस्ताव और पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। घर टूटने से बचाने का उनका दृष्टिकोण बे-जोड़ रहा।


जब भरत राम से मिलने आये तो लक्ष्मन के मन में भरत के प्रति बहुत अधिक क्षोभ था। लक्ष्मण ने भरत से युद्ध करने का विचार राम के सामने रखा। राम ने लक्ष्मण के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया। भरत और लक्ष्मण के बीच की खाई को दूर किया।


लक्ष्मण के कहने पर ही राम भरत से चित्रकूट में मिले। लक्ष्मण
के मन में भरत के प्रति संदेह था, राम ने लक्ष्मण को समझाया कि भरत कैकेयी के विचारों से कोई मेल नहीं है भरत निष्कपट हैं। दो भाइयों के बीच की संदेहात्मक खाई को दूर करने का राम का तरीका अद्भुत एवं अनुपम सिद्ध हुआ।


इन्द्र-पुत्र जयन्त को राम ने सख्त सजा दी और अय्याशी में पले-बढ़े, बिगड़े राजकुमारों की अनर्गल हरकतों पर जबरदस्त लगाम कस दी थी।


राम ने भयभीत समाज को निर्भय बनाया। आज की भाषा में कहा जाये तो कहा जायेगा कि राम ने जंल में निवास रत लोगों के हक की लड़ाई लड़ी। स्त्रियों के प्रति दुर्व्वहार करनेवालों को राम ने कभी नहीं बख्शा चाहे वह व्यक्ति तब का अवध्य ब्राह्मणही क्यों न हो।


चौदह वर्ष के वनवास में लक्ष्मण और सीता के बीच भी खाई पैदा हो गई थी और राम ने लक्ष्मण के पक्ष को जान कर उस विषय को सदा सदा के लिये समाप्त किया।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

जैन : इतिहास का एक पन्ना


श्रवणबेलगोला से मिले शिलालेखों के अनुसार, चंद्रगुप्त अपने अंतिम दिनों में जैन-मुनि हो गए। चन्द्र-गुप्त अंतिम मुकुट-धारी मुनि हुए, उनके बाद और कोई मुकुट-धारी (शासक) दिगंबर-मुनि नही हुए। अतः चन्द्र-गुप्त का जैन धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। स्वामी भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोल चले गए। वहीं उन्होंने उपवास (संथारा) द्वारा शरीर त्याग किया। श्रवणबेलगोल में जिस पहाड़ी पर वे रहते थे, उसका नाम चंद्रगिरि है और वहीं उनका बनवाया हुआ 'चंद्रगुप्तबस्ति' नामक मंदिर भी है।

राम नवमी : राम जन्म


राम के जीवन को आदर्श मानकर जीवन जीने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं। राम का विरोध करनवाले भी हैं। राम के पक्ष और विपक्ष में रहनेवाले लोग, सीता हरण के पश्चात सीता को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास से सरोकार नहीं रखते।
पिता, पुत्र, भाई, राजा, शिष्य आदि अनेक जिम्मेदारियों को आदर्श मानते हैं, बताते भी हैं पर उनमें से यदि किसी की पत्नि का अपहरण हो जाये तो पत्नि को पुनः प्राप्त करने के राम के प्रयास का अनुसरण नहीं करते।
अपनी पत्नि को पुनः प्राप्त करने का प्रयास झाबुआ के भील करते हैं। झाबुआ में भीलों के इस प्रकार के प्रयास सराहनीय माने जाना चाहिये पर इतर रामभक्त लोग भीलों के इस प्रयास की निन्दा करते देखे जा सकते हैं। सीता को घर में पूर्ववत स्थान मिलने को लेकर अयोध्या के धोबी बन जाने को आतुर यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान हैं।
राम ने नारी के सम्मान में अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ी पर तथाकथित सभ्य समाज की स्त्री के प्रति ढीटता के समक्ष राम अवश्य हार गये। आज भी अयोध्या में राम कम और स्त्री को लेकर टीका टिप्पणी करनेवाले धोबी और उन धोबियों के समर्थक आज भी कम नहीं है। सीता परित्याग के कारुणिक दृश्यों पर आँसू बहाना मानवीय जीवन मूल्यों की ऊँचाई को रेखांकित नहीं करता। निस्संदेह राम सीता महान हो सकते हैं पर उस समय के घटनाचक्र समाज की निकृष्टता के अनुपम उदाहरण हैं। उस त्रेतायुग से तो आज का कलियुग बहुत अच्छा है।
झाबुआ के जनजाति समाज के लोग नारी के प्रति परित्याग जैसा दुर्व्यवहार करते कभी नहीं दिखते। नारी का परित्याग करना यहाँ अच्छा नहीं माना जाता। राम के जीवन के अनेक उत्कृष्ट पहलुओं को अपने जीवन का अंग बनाये रखनेवाले भील आज भी स्वघोषित सभ्य समाज के सम्मान से दूर हैं व एकाकी हैं।
तत्कालीन समय में अन्याय के प्रतिकार में सदैव उद्यत तथा न्याय का साथ निभाने वाले भीलों का अनुगमन राम ने ही किया होगा। भले ही शिव या सूर्य के अवतार हों पर हनुमान, सुग्रीव आदि वन के श्रेष्ठ नर वानर भील ही थे। आंशिक रूप में ही सही पर आज भी हनुमान जैसा साहसिक गुण और सुग्रीव जैसी लंपटता यदा-कदा वनांचल में दिखाई दे जाती है।