रविवार, 26 मार्च 2017
रविवार, 14 अगस्त 2016
:: स्वतन्त्रता दिवस का चिंतन ::
स्वास्थ्य को लेकर सरकार की पहल सराहनीय हो गई है, जगह जगह एम्बुलेंस सजगता के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। पुलिस विभाग भी कुछ अर्से से सजग व चौकन्ना हो गया है। प्रधानमंत्री सड़कों ने क्रान्ति लादी है। स्कूल चलो अभियान सफलता के शिखर छू रहा है। इसके बावजूद भी अनेक समस्यायें रुकावट बनकर खड़ी हैं। लोकतन्त्र की आवाज धरने प्रदर्शन लगभग न के बराबर हैं। ऐसा तो नहीं हो रहा कि कहीं हम अपनी ही गुलामी की दिशा में आगे बढ़ रहे हों?
ठंड की रातों में रात में दो बजे स्टेशन पर पर कोई भूली बिसरी आवाज चाय गर्म. .... की तरह अब धरने और प्रदर्शन लगभग मन्द से हो गये हैं, ऐसे कानून बन गये हैं कि धरना देना अपराध सा हो गया है। धरना देना है तो किसी एक कोने में स्थान निश्चित है, जैसे दिल्ली में जन्तर मन्तर, भोपाल में जहांगीराबाद के पास।
धरना लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम होता है। सड़क तो रोक ही नहीं सकते। प्रदर्शन भी न के बराबर हैं। सरकार ताकतवर होती जा रही हैं! जनता की ताकत घटती जा रही है। जनता की बनाई सरकार पर जनता का नियंत्रण घटता जा रहा है। ऐसे कभी नहीं होगा कि सरकार अपनी दम पर सदा आदर्श बनी रहे, घोड़े की लगाम की तरह सरकार पर चौकसी, जनता को सदैव सजग रहना होगा, चाबुक दिखाने के लिये भी हो और मारने के लिये भी।
सरकार बनीं रहेगी, संचालन करनेवाले दल बदलते रहेंगे।सभी नागरिक के नाते सोचें कि कहीं जाने अनजाने हम अपने ही बनाये जाल में तो नहीं उलझते जा रहें हैं? कुछ बातें स्मरणीय, चिंतनीय हैं:-
राजनैतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति का काकस तो नहीं बन रहा है। जनता के साथ घुलमिल कर काम करनेवाले विपक्षी दल भी कमजोर तो नहीं हो रहे हैं। जनता के जागृत लोग अपनी संख्या में बढ़ रहे हैं कि नहीं, जीवित जागृत समाज लोकतंत्र का असली प्रहरी है।
माही-नर्मदा क्षेत्र (अपना क्षेत्र::आलीराजपुर+झाबुआ)
झाबुआ और आलीराजपुर दो जिलों की जनसंख्या अब बीस लाख के पार हो गई है। इसमें 88% (17,60,000) लोग गरीब कर्जदार, अभावग्रस्त हैं। अर्थात ढाई लाख से अधिक परिवार। इन ढाई लाख परिवारों का दुख जानने का का कोई सिस्टम बनाया गया है क्या? वह सिस्टम कहीं फैल हो जाये तो उसे ठीक कैसे किया जायेगा, ठीक कौन करेगा? यह ज्वलंत प्रश्न है।
12% (24000) लोग अर्थात लगभग 35 हजार परिवार कर्जदार नहीं हैं, अभावग्रस्त भी नहीं हैं, समपन्न हैं, सम्पन्न परिवारों की भी समस्यायें हैं, इनकी समस्याओं के समाधान में सामाजिक संस्थायें, पत्र, पत्रकार, राजनैतिक दल, सरकारी तंत्र ही सक्रिय हैं। अभी में देख रहा हूँ कि गाँवों के साथ जिला केन्द्र पर बिजली कभी भी किसी भी समय चली जाती है। गाँव में क्या हाल हैं, वर्षाकाल में यह स्थिति है। जबकि इस समय बिजली की खपत बहुत कम है। बिजली विभाग सही काम करे, किसकी जवाबदारी है ?
कृषि प्रधान जिले में कृषि विभाग क्या कर रहा है? आलीराजपुर+झाबुआ जहाँ 14 लाख पशु रहते हैं, उन दोनों जिलों में पशुचिकित्सालय हैं भी कि नहीं यह देखना किसका काम हैं? पशु चिकित्सा में ये दोनों जिले अत्यधिक पिछड़े हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जिन्दा है या मर गया है किससे पूछें? साढ़े तीन लाख विद्यार्थी जिस जगह पढ़ते हों उन दोनों जिलों के शिक्षक किस हालत में हैं उनका सुख दुख जानने के लिये क्या करें? उनका शैक्षणिक प्रशिक्षण सही चलता है कि नहीं, कौन जिम्मेदार है?
इण्टरनेट सेटेलाइट से जहाँ तालाबों की प्रचुर संख्या का पता चल जाता हो वहाँ स्टाप डैम में सही समय पर रिपेयर होकर गेट लग जायें , कौन सा विभाग इसके लिये जिम्मेदारी वहन कर रहा है? कहीं सरकारी विभाग आपसी खींचतान में तो नहीं उलझ गये? पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या जनपद और जिला परिषद अपना काम सही ढंग से कर पा रहीं हैं? सांसद, विधायक लोकप्रतिनिधि के रूप में काम कर पा रहे हैं? जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी ताकत कहाँ लग रही है?
देश का प्रधानमंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी अपनी सरकारी मशीनरी को स्मूथ चलाने के लिये अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को क्या सक्षम बना चुके हैं या सक्षम बना रहें हैं ? विपक्षी दल ठीक से काम करे, इसकी फिकर में कौन है? लोकतंत्र में जनता सजगता दिखाये तो इस सजगता को समझने के लिये सत्तापक्ष की तरफ से कौन नियुक्त है?
स्वतन्त्रता दिवस एक दिन के लिये मनाना ठीक है पर जरूरत है इसे एक मास तक आत्मविश्लेषण के रूप में मनाने की। सरकारी तंत्र , सामाजिक संस्थायें, सांस्कृतिक संगठन, राजनैतिक दल, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्र-पत्रकार मिलकर साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आत्मविश्लेषण द्वारा इस तरह के प्रयास करें जिससे लोकतंत्र अपनी कसौटी पर सही रहे व हमेशा खरा उतरे।
70 वें स्वतन्त्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना?
ठंड की रातों में रात में दो बजे स्टेशन पर पर कोई भूली बिसरी आवाज चाय गर्म. .... की तरह अब धरने और प्रदर्शन लगभग मन्द से हो गये हैं, ऐसे कानून बन गये हैं कि धरना देना अपराध सा हो गया है। धरना देना है तो किसी एक कोने में स्थान निश्चित है, जैसे दिल्ली में जन्तर मन्तर, भोपाल में जहांगीराबाद के पास।
धरना लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम होता है। सड़क तो रोक ही नहीं सकते। प्रदर्शन भी न के बराबर हैं। सरकार ताकतवर होती जा रही हैं! जनता की ताकत घटती जा रही है। जनता की बनाई सरकार पर जनता का नियंत्रण घटता जा रहा है। ऐसे कभी नहीं होगा कि सरकार अपनी दम पर सदा आदर्श बनी रहे, घोड़े की लगाम की तरह सरकार पर चौकसी, जनता को सदैव सजग रहना होगा, चाबुक दिखाने के लिये भी हो और मारने के लिये भी।
सरकार बनीं रहेगी, संचालन करनेवाले दल बदलते रहेंगे।सभी नागरिक के नाते सोचें कि कहीं जाने अनजाने हम अपने ही बनाये जाल में तो नहीं उलझते जा रहें हैं? कुछ बातें स्मरणीय, चिंतनीय हैं:-
राजनैतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, ब्यूरोक्रेट्स और उद्योगपति का काकस तो नहीं बन रहा है। जनता के साथ घुलमिल कर काम करनेवाले विपक्षी दल भी कमजोर तो नहीं हो रहे हैं। जनता के जागृत लोग अपनी संख्या में बढ़ रहे हैं कि नहीं, जीवित जागृत समाज लोकतंत्र का असली प्रहरी है।
माही-नर्मदा क्षेत्र (अपना क्षेत्र::आलीराजपुर+झाबुआ)
झाबुआ और आलीराजपुर दो जिलों की जनसंख्या अब बीस लाख के पार हो गई है। इसमें 88% (17,60,000) लोग गरीब कर्जदार, अभावग्रस्त हैं। अर्थात ढाई लाख से अधिक परिवार। इन ढाई लाख परिवारों का दुख जानने का का कोई सिस्टम बनाया गया है क्या? वह सिस्टम कहीं फैल हो जाये तो उसे ठीक कैसे किया जायेगा, ठीक कौन करेगा? यह ज्वलंत प्रश्न है।
12% (24000) लोग अर्थात लगभग 35 हजार परिवार कर्जदार नहीं हैं, अभावग्रस्त भी नहीं हैं, समपन्न हैं, सम्पन्न परिवारों की भी समस्यायें हैं, इनकी समस्याओं के समाधान में सामाजिक संस्थायें, पत्र, पत्रकार, राजनैतिक दल, सरकारी तंत्र ही सक्रिय हैं। अभी में देख रहा हूँ कि गाँवों के साथ जिला केन्द्र पर बिजली कभी भी किसी भी समय चली जाती है। गाँव में क्या हाल हैं, वर्षाकाल में यह स्थिति है। जबकि इस समय बिजली की खपत बहुत कम है। बिजली विभाग सही काम करे, किसकी जवाबदारी है ?
कृषि प्रधान जिले में कृषि विभाग क्या कर रहा है? आलीराजपुर+झाबुआ जहाँ 14 लाख पशु रहते हैं, उन दोनों जिलों में पशुचिकित्सालय हैं भी कि नहीं यह देखना किसका काम हैं? पशु चिकित्सा में ये दोनों जिले अत्यधिक पिछड़े हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण जिन्दा है या मर गया है किससे पूछें? साढ़े तीन लाख विद्यार्थी जिस जगह पढ़ते हों उन दोनों जिलों के शिक्षक किस हालत में हैं उनका सुख दुख जानने के लिये क्या करें? उनका शैक्षणिक प्रशिक्षण सही चलता है कि नहीं, कौन जिम्मेदार है?
इण्टरनेट सेटेलाइट से जहाँ तालाबों की प्रचुर संख्या का पता चल जाता हो वहाँ स्टाप डैम में सही समय पर रिपेयर होकर गेट लग जायें , कौन सा विभाग इसके लिये जिम्मेदारी वहन कर रहा है? कहीं सरकारी विभाग आपसी खींचतान में तो नहीं उलझ गये? पंचायत एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या जनपद और जिला परिषद अपना काम सही ढंग से कर पा रहीं हैं? सांसद, विधायक लोकप्रतिनिधि के रूप में काम कर पा रहे हैं? जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी ताकत कहाँ लग रही है?
देश का प्रधानमंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी अपनी सरकारी मशीनरी को स्मूथ चलाने के लिये अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को क्या सक्षम बना चुके हैं या सक्षम बना रहें हैं ? विपक्षी दल ठीक से काम करे, इसकी फिकर में कौन है? लोकतंत्र में जनता सजगता दिखाये तो इस सजगता को समझने के लिये सत्तापक्ष की तरफ से कौन नियुक्त है?
स्वतन्त्रता दिवस एक दिन के लिये मनाना ठीक है पर जरूरत है इसे एक मास तक आत्मविश्लेषण के रूप में मनाने की। सरकारी तंत्र , सामाजिक संस्थायें, सांस्कृतिक संगठन, राजनैतिक दल, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्र-पत्रकार मिलकर साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को आत्मविश्लेषण द्वारा इस तरह के प्रयास करें जिससे लोकतंत्र अपनी कसौटी पर सही रहे व हमेशा खरा उतरे।
70 वें स्वतन्त्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामना?
शनिवार, 16 जुलाई 2016
भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, रुड़की
भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, रुड़की के बीस छात्र शैक्षणिक भ्रमण पर झाबुआ में कल 16/07/2016 प्रात: 9-30 पर शिवगंगा आश्रम मेघनगर में पहँचे । अपराह्न 11-30 बजे चार समूहों में चार दिशाओं अलग अलग गाँव में जाने के केलिये निकले। एक समूह थाँदला, एक मेघनगर, एक झाबुआ, एक राणापुर तहसील में पहुँचा।
राणापुर। के समूह के साथ कुछ समय में भी रहा। गाँवों में तकनीकि का का स्वरूप कैसा है? यह प्रश्न समूह के सभी पाँचों छात्रों के मन में था।
हम सभी उससे यह जानने पहुँचे कि तुम्हारी पत्नि इस पर्दे से क्या कर रहीं हैं?
युवा किसान ने बताया कि इस दवा से ज्वार मर जाती है, मूमफली का दवा का कोई असर नहीं होता। खेत में चारा बहुत हो गया है, चारे को मारने की दवा है।
ज्वार के ऊपर दवा न गिरे, इसलिये हमने यह कपड़े को लकड़ी की फ्रेम पर कसे दिया है, इससे यह दवा ज्वार के पौधों पर नहीं गिर पाती।
गाँव में सरलता से बननेवाले यह टैक्नोलॉजी का उदाहरण है।
राणापुर। के समूह के साथ कुछ समय में भी रहा। गाँवों में तकनीकि का का स्वरूप कैसा है? यह प्रश्न समूह के सभी पाँचों छात्रों के मन में था।
हम सभी उससे यह जानने पहुँचे कि तुम्हारी पत्नि इस पर्दे से क्या कर रहीं हैं?
युवा किसान ने बताया कि इस दवा से ज्वार मर जाती है, मूमफली का दवा का कोई असर नहीं होता। खेत में चारा बहुत हो गया है, चारे को मारने की दवा है।
ज्वार के ऊपर दवा न गिरे, इसलिये हमने यह कपड़े को लकड़ी की फ्रेम पर कसे दिया है, इससे यह दवा ज्वार के पौधों पर नहीं गिर पाती।
गाँव में सरलता से बननेवाले यह टैक्नोलॉजी का उदाहरण है।
शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
शिवगंगा का प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट
जैसे-जैसे ताकत बढ़ती है और अपनी कल्पना को साकार स्वरूप देने की क्षमता बढ़ती है, साधन उपलब्ध होने लगते हैं तो योजनाओं बनने लगती हैं। प्लानिंग होती है। कल का वह गरीब आदमी कुछ करता नजर आता है। मानो वह सोचता हो कि उसका घर होगा। उसके कमरे कितने होंगे, आर्किटेक्ट कौन होगा आदि प्रश्न उसके मन में आने लगते हैं। जैसे जैसे हैसियत बढ़ती है यह सब होता ही है।
उदाहरण के लिये यदि चित्रकार है तो उसके चित्र के रंग उभरने लगते हैं। चित्र की कल्पना नयी नहीं होती। चित्र वही है परन्तु क्या वह सब रंग एक साथ भरता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। पहले वह आउटलाइन खींचता है। क्या कोई ऐसा कहेगा कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ नहीं है, सो बात नहीं। धीरे-धीरे कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट कहा गया है, बैसा होता है।
सबेरे चार बजे हम अपनी खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो सामने का वृक्ष का अंधेरे में दिखाई देता है; परन्तु साफ नहीं। धीरे-धीरे प्रकाश फैलता। वृक्ष स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वृक्ष वही है। कोई ऐसा नहीं कहा सकता कि नया वृक्ष उग आया। पहले जो नहीं था बैसा एकाएक हो गया, सो बात नहीं। पेड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । बस प्रकाश अधिक होने से डाली, पत्ते, फूल सभी कुछ दिखाई देने लगे हैं। अनफोल्डमेंट का मतलब यही है, कि चीज वही है फिर भी उसका दर्शन क्रमश: होने लगा।
इसी प्रकार ध्येय साकार होता है। कुछ सिद्धान्तों पर आधारित ध्येय लेकर हम प्रारंभ करते हैं। जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है यह प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट होता है। यह आवश्यक भी है । बिना शक्ति के जिस कल्पना को पागलपन करार दिया जाता है वही अब बुद्धिमानी मानी जाती है । इसलिये क्षमता बढ़ने के साथ साथ कल्पना साकार होना ठीक है ।
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उक्त विचार दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के हैं
उदाहरण के लिये यदि चित्रकार है तो उसके चित्र के रंग उभरने लगते हैं। चित्र की कल्पना नयी नहीं होती। चित्र वही है परन्तु क्या वह सब रंग एक साथ भरता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। पहले वह आउटलाइन खींचता है। क्या कोई ऐसा कहेगा कि आउटलाइन के आगे उसके सामने कुछ नहीं है, सो बात नहीं। धीरे-धीरे कल्पना साकार होती है। अंग्रेजी में इसे प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट कहा गया है, बैसा होता है।
सबेरे चार बजे हम अपनी खिड़की के बाहर झाँकते हैं तो सामने का वृक्ष का अंधेरे में दिखाई देता है; परन्तु साफ नहीं। धीरे-धीरे प्रकाश फैलता। वृक्ष स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वृक्ष वही है। कोई ऐसा नहीं कहा सकता कि नया वृक्ष उग आया। पहले जो नहीं था बैसा एकाएक हो गया, सो बात नहीं। पेड़ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । बस प्रकाश अधिक होने से डाली, पत्ते, फूल सभी कुछ दिखाई देने लगे हैं। अनफोल्डमेंट का मतलब यही है, कि चीज वही है फिर भी उसका दर्शन क्रमश: होने लगा।
इसी प्रकार ध्येय साकार होता है। कुछ सिद्धान्तों पर आधारित ध्येय लेकर हम प्रारंभ करते हैं। जैसे-जैसे शक्ति बढ़ती है यह प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट होता है। यह आवश्यक भी है । बिना शक्ति के जिस कल्पना को पागलपन करार दिया जाता है वही अब बुद्धिमानी मानी जाती है । इसलिये क्षमता बढ़ने के साथ साथ कल्पना साकार होना ठीक है ।
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उक्त विचार दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के हैं
शुक्रवार, 24 जून 2016
गुरुवार, 23 जून 2016
विजन इण्डिया फाउण्डेविज 20 दिवसीय कार्यशाला जून 2016
18 जून 2016 को हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन के 20 दिवसीय कार्यशाला में एक दिन सम्मलित हुये। शिवगंगा झाबुआ की ओर से हम वहाँ सामाजिक सहभागिता के अनुभवों के आदान प्रदान के लिये पहुँचे। हमारे लिये दिल्ली पहुँचने तक यह भी मालूम नहीं था कि कार्यक्रम के आयोजन कर्ता कौन हैं ? चिन्मय जैन ने अप्रैल में मुझे बताया था कि एक कैंप आईआईटी दिल्ली कि लड़कों का है, जिसमें आपको उसमें पब्लिक पार्टीशिपेशन विषय रखना है। कार्यक्रम जून में था इसलिए मैंने हाँ कह दिया। चिन्मय झाबुआ आते जाते रहते हैं इसलिये मैं निश्चिंत था पर मैंने उनसे कहा कि हम झाबुआ से एक नहीं, चार व्यक्ति वहाँ जाना चाहेंगे, चिन्मय ने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों से बात करके हम चार व्यक्तियों को उसमें (विजन इण्डिया फाउण्डेशन) के कार्यक्रम में सहभागी बनने की सहमति दे दी ।
17 जून अर्थात ट्रैन में ही हमको पता चला कि कैंप स्थल सोनीपत में है और हमें नई दिल्ली के स्थान पर न उतरकर पानीपत में ट्रेन से उतरना चाहिए। चिन्मय जी ने हमें अजेय का मोबाइल नम्बर दिया। हमने अजेय से बात की, अजेय ने हमें पानीपत रेलवे स्टशन पर रिसीव करने की बात कही। सुबह जब हम पानीपत स्टेशन पर पहुँचे तो अजेय वहाँ पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रात: 6 बजे थे, वहाँ से एक घंटे का सफर और शेष था हम 7 बजे "जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी" के भव्य एवं अत्यधिक आधुनिक कैंपस में पहुँच गये।

इस कैंपस में 200 फुट ऊँचे खंबे पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हवा पूर्ण तेजस्विता के साथ लहरा रहा था। यूनिवर्सिटी कैंपस की भव्यता बता रही थी कि आधुनिक भारत के शिक्षा केन्द्र में आपका तहे दिल से स्वागत है। पानीपत से सोनीपत की एक घंटे की यात्रा में हमने विजन इण्डिया फाउण्डेशन के विषय में जानकारी प्राप्त की। हम जैसे जैसे अजेय जी से बात करते जा रहे थे, अजेय हमें बता रहे थे कि कैसे विजन इण्डिया फाउण्डेशन का निर्माण हुआ ।
अजेय ने कहा कि भारत के युवा देश के लिये बहुत कुछ करना चाहते हैं पर उन्हें ऐसा माहौल नहीं मिलता। विजन इण्डिया फाउण्डेशन युवाओं को ऐसा वातावरण देना चाहता है, जिसमें उन्हें काम करने में आनन्द आये, वह उत्साह से भरे रहें, युवाओं को भविष्य की चुनौतियाँ क्या हैं ? वे चुनौतियों को स्वीकार करें और उनको समझ कर उन चुनौतियों से निपटने का सशक्त रास्ता बनायें।
अजेय के बोलने में उनका आत्मविश्वास स्पष्ट झलक रहा था। उनकी वाॅडी लैंग्वेज कह रही थी कि महेश जी दुनिया के आने वाले स्वर्णिम भविष्य का निर्माण भारत के युवा बनायेंगे, आप निश्चिंत रहें। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को आश्वस्त कर रही थी। हमारी जिज्ञसायें थीं जिन्हें हमने बातचीत के जरिये, शान्त किया। हम जानना चाहते थे कि यहाँ 140 विद्यार्थी कहाँ कहाँ से आये हैं ? अजेय ने बताया कि ये सभी स्टूडेंट्स भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से यहाँ विद्यार्थी बनकर आये हैं। बेंगलूर की लाॅ यूनिवर्सिटी से कुछ छात्र थे तो कुछ जेएनयू से। आईआईटी दिल्ली, मुम्बई रुड़की, कानपुर बहुत से महाविद्यालय जिनके हमें अब नाम भी याद नहीं रहे।
हम विजन इण्डिया फाउण्डेशन में स्पीकर थे अत: हमारी सहायता व सेवा के लिये जिस विद्यार्थी की ड्यूटी लगाई

उनका नाम था अनिल। अनिल उन 30 प्रबन्धकों में से एक थे जो इस bootcamp की सफलता के सूत्रधार थे। कुछ ही समय के अन्दर उनकी कार्यकुशलता को देखकर, हमें यह लगने लगा छोटे छोटे दिखने वाले ये लड़के बहुत बड़े काम करने में सक्षम सक्षम रहे हैं, हमें भी इनका सहयोग करना चाहिए, हमारे सहायक बनाये गये अनिल के चेहरे का तेज बताता था कि वह कुछ बड़ा करने का आत्मविश्वास प्राप्त कर चुका है। अनिल भारत के किस प्रान्त से हैं यह मैं भूल गया।
शिवजी के हलमा की लघु फिल्म दिखाकर हमने अपने विषय को तीन भागों में में पूर्ण किया। पहले भाग में मे राजाराम कटारा जी और भवरसिंह भयड़िया जी ने शिवगंगा झाबुआ के कार्य कार्यक्रम व उनके उद्देश्य, दृश्य एवं श्रव्य माध्यम से से 25 मिनट में बताये, मैंने तो मेरे अनुभव सुनाये-मुझे झाबुआ के विषय में 1998 में जो बताया गया था अर्थात झाबुआ की इमेज, और कुछ समय बाद वास्तव में मुझे झाबुआ दिखा, झाबुआ की इमेज अच्छी नहीं है पर झाबुआ बहुत अच्छा है। झाबुआ को उपदेश देकर नहीं समझ सकते। वहाँ से सीखने के लिये भी बहुत ज्ञान की बातें हैं। करने के लिये भी बहुत काम हैं।
वहाँ का मंच न केवल आकर्षक था अपितु श्रोता और वक्ता की बीच एक शक्तिशाली माध्यम बनाता था।
कठिन से कठिन विषयों की जुगाली(विचार विमर्श ) करने के लिये लिये एक और अन्य स्थान था जिसका नाम था "अड्डा" अड्डा में बैठकर छात्र घंटों तक डिस्कस करते। हमारा विषय समाप्त हुआ, हम चाय पान के पश्चात जब हम अड्डे पर पहुँचे तो प्रश्न उत्तर शुरू हो गये, बातों ही बातों में हमें पता ही ना चला कि कब साम के छ: बज गये। डेड़ घंटे का समय सार्थक विचार विमर्श में समाप्त हो गया। समय तो हमेशा ही कम पड़त है पर 18 जून के उस डेड़ घंटे में हमारी झोली नये ज्ञान से लबालब भरी थी
सदा प्रसन्न रहनेवाले ये छात्र विजन इण्डिया फाउण्डेशन के कार्यक्रम में आये भारत का लघुकथा रूप थे। वे आपस में इतने घुल मिल गये थे कि उनमें कौन कब से , कहाँ से दोस्त बना, जानना मुश्किल था। वे अधिकांश लँगोटिया यार (बचपन के दोस्त) लग रहे थे। उन प्रतिभागी छात्रों में परस्पर 'वर्किंग टू गैदर इज सक्सेस' का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हो रहा था।
170 विजनरी नवयुवक इसमें बन रहे थे। लिविंग टू गैर इज प्रोग्रेस के सूत्र के अनुसार बना रहे थे। साथ रहकर सीख रहे थे।
युवाओं की ऐसी मस्ती तो बहुत जगह दिख सकती है पर इस यंग इण्डिया में एक साथ एकट्ठे होने में ' हम मस्तों में आने मिले कोई हिम्मत वाला रे' का आह्वान स्पष्ट दिख रहा था। उन छात्रों के बीच विजन इण्डिया फाउण्डेशन के आयोजकों ने ऐसा कुछ वातावरण तैयार किया था जिससे वह चाहे जैसे फिल्मी गाने गाते हों पर उसकी ध्वनि "यहाँ गाते हैं राँझे मस्ती में , मस्ती है झूमे ...... के भाव सभी के मन में थे।
कुल मिलाकर विजन इण्डिया फाउण्डेशन ने हमें उस समय चौंका दिया कि जब। में पता चला इसके आयोजक आईआईटी रुड़की और दिल्ली, मुंबई के कुछ याने सात यंग शिक्षक हैं, ठीक कहा 7 शिक्षक। चाणक्य सीरियल के शिक्षक, न कि किसी आईआईटी कालेज के फैकल्टी मैंम्बर । धन की सरकारी सहायता के बिना उससे आर्थिक सहायता की अपेक्षा किये बिना, यह नये स्वर्णिम भारत के निर्माण में लगे हैं।
जब हमने पूछा कि इतने अधिक बजट की यह 20 दिवसीय कार्यशाला बिना धन के कैसे चल रही है? हमारे साथी मित्र अनिल ने बताया कि यहाँ आया प्रत्येक विद्यार्थी 30 हजार रुपये शुल्क देकर आया है। प्रत्येक वप्रत्ये30000/= रुपये 20 दिन की शिक्षा? हमें आश्चर्य तो हो रहा है पर सत्य को झुठलाया भी नहीं जा सकता।
धन्यवाद विजन इण्डिया फाउण्डेशन एवं उनकी टीम, नोमेश शोभित मोहित अजेय पराग आनन्द चिन्मय।
सभी टीम सदस्य ! और कुछ हो न हो पर आपके माता पिताओं ने आप लोगों के नाम सोच समझ के ही रखे हैं , आपके काम को देख कर तो यही लगता रहा है ।
महेश शर्मा 'शिवगंगा गुरुकुल धरमपुरी झाबुआ' मध्यप्रदेश ।।
शनिवार, 14 मई 2016
उज्जैन में प्रधानमंत्री का उद्बोधन, सिंहस्थ के पराप्रेक्ष्य में
उज्जैन, 14 मई: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उज्जैन सिंघस्थ कुम्भ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए मीडिया पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि हमारे मीडिया को शॉर्टकट मारने की आदत है इसलिए वह चुन चुन कर चीजों को दिखाता है। मोदी ने कहा कि लोग हमें कहते हैं कि हम तो बहुत ही अनऑर्गनाइज्ड और बड़े ही विचित्र प्रकार का जीवन जीने वाले लोग हैं, वास्तविकता यह है कि हमें हमारी बातों को सही तरीके से रखनी आती ही नही है और जिनको रखने की जिम्मेदारी है, जिन्होंने इस प्रकार के प्रोफेशन को स्वीकार किया है वे भी अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से नहीं निभाते हैं।
उन्होंने इशारों इशारों में कहा कि मीडिया ने इस कुंभ मेले की एक ही पहचान बना दी गई है – नागा साधु, यह सब इसलिए हुआ है, क्योंकि ब्रांडिंग ठीक तरह से नहीं की गई। उनकी तस्वीर निकालना, उसी को प्रचारित करना और कुंभ को इसी के आसपास सीमित कर दिया गया है।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “क्या हम दुनिया के लोगों से कह सकते हैं कि हमारी इतनी बड़ी ऑर्गनाइजिंग कैपिसिटी है? क्या यह बता सकते हैं कि इस आयोजन के लिए किसी को निमंत्रणपत्र गया था, सर्कुलर जारी किया गया था जो इतनी बड़ी संख्या में लोग क्षिप्रा के तट पर आ गए। यह मैनेजमेंट की दुनिया की सबसे बड़ी घटना है।”
मोदी ने कहा, “यहां तीस दिन तक इतनी संख्या में हर रोज लोग आते हैं, जितनी जनसंख्या यूरोप के एक देश की है। मगर हम भारत की ब्रांडिंग का परिचय नहीं दे पा रहे हैं।”
उन्होंने भारत में होने वाले चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि यह दुनिया के लिए अजूबा है। इतना बड़ा देश, दुनिया के कई देशों से ज्यादा वोटर, और हमारा चुनाव आयोग आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए चुनाव कराता है। यह प्रबंधन के क्षेत्र में दुनिया के लिए सबसे बड़ी ‘केस स्टडी’ है।
मोदी ने कहा, “हमें भारत को वैश्विक रूप में प्रदर्शित करने के लिए विश्व जिस भाषा को समझता है, जिस तर्क को समझता है, उसी भाषा में समझाने की जरूरत है और इसके लिए हमें चिंतन-मनन करना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है।
प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं अपने तरह से जब सोचता हूं तो लगता है, इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के द्वारा होता था। तर्क और अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि समाज की चिंता करने वाले मनीषी 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ के मौके पर इकट्ठा होते थे, विचार-विमर्श करते थे और बीते वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे। इसके साथ ही समाज के लिए अगले 12 वर्षो की दिशा क्या होगी, इसे तय करते थे।”
उन्होंने आगे कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत महात्मा तय एजेंडे पर काम करने लगते थे। इतना ही नहीं, तीन वर्ष उज्जैन, नासिक और इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे इकट्ठा होते थे, तब उनके बीच इस बात पर विमर्श होता था कि प्रयाग में जो तय हुआ था, उस दिशा में क्या हुआ। फिर उसके बाद आगामी तीन वर्ष का एजेंडा तय होता था।
मोदी ने कहा कि यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी, मगर धीरे-धीरे इसका रूप बदला। अनुभव यह है कि परंपरा तो रह जाती है, मगर प्राण खो जाते हैं। कुंभ के साथ भी यही हुआ, अब कुंभ सिर्फ डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक सीमीत रह गया है।
उन्होंने कहा कि संतों के आशीर्वाद से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ। यह प्रयास सदियों पुरानी परंपरा का आधुनिक संस्करण है। इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है। इस मंथन से जो 51 अमृतबिंदु निकले हैं, समाज के लिए प्रस्तुत किए गए हैं।
प्रधानमंत्री ने विचार कुंभ के समापन मौके पर मौजूद साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुख से आह्वान किया कि मंथन से जो 51 अमृतबिंदु निकले हैं, उन पर सभी परंपराओं के अंदर रहकर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार जरूर करें।
उन्होंने कहा कि मोक्ष की बातें तो करें, मगर एक सप्ताह ऐसा हो जिसमें धरती की सच्चाई पर चर्चा हो, उसमें यह बताया जाए कि पेड़ क्यों लगाना चाहिए, बेटी को क्यों पढ़ाना चाहिए, धरती को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए, नारी का सम्मान क्यों करना चाहिए।
इससे पहले, प्रधानमंत्री मोदी विशेष विमान से इंदौर पहुंचे, हवाईअड्डे पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अन्य लोगों ने उनकी अगवानी की। मोदी यहां से श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना के साथ उज्जैन के निनोरा के लिए रवाना हुए।
निनोरा में हुए इस कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने की। मंच पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के अलावा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत और मेजबान मुख्यमंत्री शिवराज भी उपस्थित रहे।
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